आज जरूर पढ़े गुरु प्रदोष की ये कथा

एकादशी की भांति ही प्रदोष व्रत की भी बहुत मान्यता है। ये व्रत प्रत्येक माह में दो बार आता है, शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष में। ये व्रत त्रयोदशी तिथि को पड़ता है तथा शिव जी को समर्पित होता है। मान्यता है कि ये व्रत करने से महादेव बहुत खुश होते हैं तथा भक्त की प्रत्येक इच्छा को पूरा करते हैं। त्रयोदशी तिथि पर रखे जाने वाले इस व्रत में शिव जी का पूजन प्रदोष काल में ही किया जाता है। प्रदोष काल को लेकर वैसे तो क्षेत्र के अनुसार कई प्रकार की मान्यताएं हैं, मगर सामान्यत: प्रदोष काल सूर्यास्त के डेढ़ घंटे पश्चात् तक माना जाता है। इसी वजह से इस व्रत को भी लोग प्रदोष व्रत के नाम से जानते हैं। इस बार ये व्रत 2 दिसंबर को बृहस्पतिवार के दिन रखा जाएगा। इस अवसर पर जानिए गुरु प्रदोष से जुड़ी ये कथा...

गुरु प्रदोष के दिन पढ़ें ये कथा:-
हफ्ते के दिन के हिसाब से प्रदोष व्रत के भिन्न-भिन्न नाम हैं। जब ये व्रत बृहस्पतिवार के दिन पड़ता है तो इसे गुरु प्रदोष के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक दिन के हिसाब से प्रदोष व्रत की कथा भी अलग अलग है। पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को हरा डाला। ये देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित  हुआ। आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया। ये देख सभी देवता भयभीत हो गुरु बृहस्पति की शरण में पहुंचे। तब बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हे वृत्रासुर का वास्तविक परिचय दे दूं। वृत्रासुर बड़ा तपस्वी तथा कर्मनिष्ठ है। उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया।

पहले वक़्त में वह राजा चित्ररथ था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहां महादेव के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देखकर उसने उनका व्रत किया। चित्ररथ के वचन सुन देवी पार्वती क्रोधित होकर उसे राक्षस होने का शाप दे दिया। चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त औतथार त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से पैदा होकर वृत्रासुर बना। गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- वृत्रासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है। इसलिए उसे पराजित करने के लिए महादेव को खुश करना होगा। इसके लिए हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत का व्रत करो। देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने जल्द ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली तथा देवलोक में शान्ति छा गई।

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