मरने तक साथ निभाने वाले

मरने तक साथ निभाने वाले

मरने तक साथ निभाने वाले छोडकर कहाँ गये हो तुम
कभी हम दम जो था तेरा फ़कत दीदार को तरसा ।
फ़िजाओं ने हवाओं ने करी थी लाख कोशीशें
कभी सावन नहीं आया कभी बादल नहीं बरसा ॥

जो थी शायरी मेरी ग़जल किसी और की है अब
टूटे दिल को लफ़्ज देकर छलकता जाम होने दो ।
अदाओं में दिखावों में बडी मशहूर रहती थी
बेवफाई की गलियों में भी उसका नाम होने दो ॥

जिसे था टूटकर चाहा तोडकर ही गया है वो
भरे बाजार में टूटा खिलौना फिर नहीं बिकता ।
जिसे अपना बनाना था उसे अब भूल जाना है
वैसा हो नहीं पाया और ऐसा हो नहीं सकता ॥