छात्रों मे आत्मविश्वास जगाना होगा

Aug 28 2015 02:34 PM
छात्रों मे आत्मविश्वास जगाना होगा

प्रतिदिन होने वाली बच्चों की आत्महत्या आज राज्यस्तर पर चिंता का विषय बन गया है। प्रतिदिन इस संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। इससे पूर्व छोटे बच्चों की आत्महत्या के प्रसंग नहीं हुए,परंतु इस प्रकार आत्महत्या की श्रृंखला सी बन जाने की यह पहली घटना है। अल्पायु में बच्चों का आत्महत्या जैसा निर्णय लेना,यह जितना आश्चर्यजनक है, उतना ही उन्हें यह निर्णय लेने को बाध्य करने वाले एवं वैसी परिस्थिति निर्माण करने वाले घटकों पर विचार करना भी आवश्यक है। जीवन का अर्थ क्या है, जीना वैसे है तथा जीवन में घटने वाले प्रसंगों का सामना वैसे करना है, जीवन के निर्णय वैसे लेने हैं।सामाजिक तथा पारिवारिक भान वैसे रखना है, यह सारा भाग विद्यार्थी अवस्था से तारुण्य अवस्था तक मनुष्य सीखता है। इस काल में होने वाले अनुभवों से ही वह आगे मार्गक्रमण करता है।इस संपूर्ण यात्रा में उसे आवश्यकता होती है किसी योग्य मार्गदर्शन की। उसकी भावनाओं को समझने वाले सहयोगियों की।वह सहयोगी कोई भी हो। माता-पिता मित्र-सखी,शिक्षक एवं अन्य कोई।

कोई भी निर्णय लेने से पूर्व स्वकीयों अथवा वरिष्ठों से उस विषय में पूछना,यह मनुष्य प्राणी का नैसर्गिक स्वभाव है। अब यह निर्णय कोई नई वस्तु क्रय करने के विषय में हो अथवा जीवन के किसी महत्वपूर्ण निर्णय के विषय में। इस समय यदि योग्य मार्गदर्शन नहीं मिला, तो मनुष्य चरमपंथी निर्णय लेनेमें भी आगे-पीछे नहीं देखता।मन को मानसिक आधार तथा भावनाओं को समझने  की नितांत आवश्यकता होने के कारण उसकी न्यूनता की आपूर्ति अभिभावक ही कर सकते हैं! बच्चों की आत्महत्या के पीछे अधिकांशत: कारण अभिभावकों का उन पर बढ़ता हुआ दबाव, अल्पायु में उन पर लादा गया अपेक्षाओं का भार है ऐसे कहा जाता है,यह बहुत मात्रा में सच भी है।

आज के भाग-दौड़ के जीवन में माता-पिता दोनों बच्चे के उज्ज्वल भविष्य हेतु चाकरी करने का, धनसंचय करने का मार्ग स्वीकारते दिखाई देते हैं। जिस अल्पायु में बच्चों पर संस्कार करने की आवश्यकता होती है, उस आयु में दिन का अधिकांश समय वे उनसे दूर रहा करते हैं। बच्चों को हमारी कमी न खले, इस हेतु उन्हें जो चाहिए, वह दिया जाता है। घर में मन लगे इसलिए वीडिओ गेम लाकर दिए जाते हैं । महंगे मोबाईल दिए जाते हैं। बच्चों को संभालने के लिए दाई काम पर