ग्लोबल वार्मिंग के cause and effect के बारे में जरा आप भी जानें

वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों के प्रभावस्वरूप पृथ्वी के दीर्घकालिक औसत तापमान में हुई वृद्धि को वैश्विक तापन/ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है | ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी से बाहर जाने वाले ताप अर्थात दीर्घतरंगीय विकिरण को अवशोषित कर पृथ्वी के तापमान को बढ़ा देती हैं, इस प्रक्रिया को ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ कहते हैं | ग्रीन हाउस गैसों में मुख्यतः कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, ओज़ोन आदि गैसें शामिल हैं |

ग्रीनहाउस गैसों में मुख्य रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड(CO2), मीथेन(CH4) , नाइट्रस ऑक्साइड(N2O), ओज़ोन (O3), क्लोरोफ़्लोरो कार्बन (CFCs) आदि गैसें शामिल हैं | किसी भी ग्रीनहाउस गैस का प्रभाव वातावरण में उसकी मात्रा में हुई वृद्धि, वातावरण में उसके रहने की अवधि और उसके द्वारा अवशोषित विकिरण के तरंगदैर्ध्य (Wavelength of Radiation) पर निर्भर करता है | ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई ऑक्साइड(CO2) वातावरण में सर्वाधिक मात्रा में उपस्थित है | ग्रीनहाउस गैसों उत्सर्जन मुख्यतः जीवाश्म ईंधनों के दहन, उद्योगों, मोटर वाहनों, धान के खेतों, पशुओं की चराई, रेफ्रीजरेटर, एयर-कंडीशनर  आदि से होता है |

हालाँकि वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में पायी जाने वाली गैसें नाइट्रोजन, ऑक्सीज़न और ऑर्गन हैं, लेकिन ये ग्रीनहाउस गैसें नहीं हैं क्योंकि इनके अणु में एक ही तत्व के दो परमाणु शामिल हैं, जैसे-नाइट्रोजन (N2) ऑक्सीज़न (O2) या फिर एक ही तत्व का परमाणु इनके अणु में पाया जाता है ,जैसे- ऑर्गन (Ar) | जब ये वाइब्रेट (Vibrate ) होते हैं तो इनके इलैक्ट्रिक चार्ज के वितरण में कोई परिवर्तन नहीं आता है, अतः ये अवरक्त विकिरण (Infrared Radiation) से लगभग अप्रभावित रहते हैं |

जिन गैसों के अणुओं में अलग अलग तत्वों के दो परमाणु पाये जाते हैं, जैसे- कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) या हाइड्रोजन क्लोराइड (HCl)  वे अवरक्त विकिरण को अवशोषित तो करते हैं लेकिन अपनी विलेयता (Solubility) और अभिक्रियाशीलता (Reactivity ) के कारण वातावरण में बहुत कम समय तक ही रहते हैं |अतः ये भी ग्रीनहाउस प्रभाव में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं देते हैं, इसीलिए ग्रीनहाउस गैसों की चर्चा करते वक्त इन्हें छोड़ दिया जाता है  |

वैश्विक तापन के संभावित परिणाम

वैश्विक तापन के संभावित परिणाम निम्नलिखित हो सकते हैं-
ग्लेशियरों का पिघलना: ताप बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने लगते हैं और उनका आकार कम होने लगता है और ग्लेशियर पीछे हटने लगते हैं |

समुद्री जलस्तर में वृद्धि : ग्लेशियरों के पिघलने से प्राप्त जल जब सागरों में मिलता है तो समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो जाती है
 

नदियों में बाढ़: ग्लेशियरों से कई बारहमासी नदियां निकलती है और ग्लेशियर के जल को अपने साथ बहाकर ले जाती हैं | यदि ग्लेशियरों के पिघलने की

दर बढ़ जाएगी तो नदी में जल की मात्रा बढ़ जाएगी जोकि बाढ़ का कारण बन सकती है, वर्षा-प्रतिरूप में परिवर्तन: वर्षा होने और बादलों के बनने में तापमान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | अतः ताप में वृद्धि के कारण वर्षा-प्रतिरूप या पैटर्न भी बदल जाएगा अर्थात कहीं वर्षा पहले से कम होगी तो कहीं पहले से ज्यादा होने लगेगी | वर्षा की अवधि में भी बदलाव आ जाएगा |

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