फिल्म '102 नॉट आउट ' : बुढ़ापे में रिकॉर्ड बनाने के जूनून के साथ जिंदगी का आइना

लेखक सौम्या जोशी द्वारा लिखे गए एक गुजराती प्ले पर आधारित फिल्म '102 नॉट आउट ' जीवन की कश्मक़श के साथ एक उम्र के बाद के पैदा हुए ताज़े जुन्नून का रोचक मंचन है. यह कहानी मुंबई के दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) और अपने बेटे बाबूलाल वखारिया (ऋषि कपूर) के अपने पिता-पुत्र-पौत्र के उतार-चढ़ाव भरे संबंधों पर बनी फिल्म है. फिल्म की कहानी 102 साल के शख्स दत्तात्रेय वखारिया की है जिनका 75 साल का बेटा बाबूलाल वखारिया उनके साथ मुंबई में रहता है.

फिल्म में  बाप जितना जिंदादिल बेटा उतना ही गंभीर है और इन सोनो के बीच इंट्री होती है धीरू (जिमित त्रिवेदी) की . जो एक दवाई की दुकान पर काम करता है और दत्तात्रेय के जिंदादिल मिज़ाज़ का फैन होता है.बागबान में अमिताभ जिस रोल में थे इस फिल्म में ऋषि कपूर वैसे ही कुछ रोल में हैं. इस फिल्म से 'बागबान' फिल्म की याद थोड़ी ताजा हो जाती है.

फिल्म बढ़ने के साथ ही दत्तात्रेय, बाबूलाल और धीरू की जिंदगी भी पटरी पर चल रही होती है, कि अचानक दत्तात्रया को सबसे ज्यादा उम्र का होकर मरेंगे और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने का जूनून चढ़ जाता है. ज्यादा उम्र के लिए उन्हें अपने आस-पास पॉजिटिव लोग चाहिए होते हैं, इसके लिए वो अपने बेटे को वृद्धाआश्रम भेजने की ठान लेते हैं.बाबूलाल वृद्धाआश्रम जाने के लिए अपने पिता की शर्तें पूरी करते हैं. पर बार बार उनके ख्याल में उनका बेटा और दत्तात्रेय का पोता अमोल जो अपने पिता और दादा जी से कोई वास्ता नहीं रखता है और अमेरिका में रहता है और इसी वजह से बाबूलाल जीना भूल चुके होते है और बाबूलाल को दोबारा जीना सिखाने में धीरू भी दत्तात्रया की मदद करता है. इस भाव को हंसी और आंसू दोनों का मिश्रण इस फिल्म में देखने को मिलेगा. 

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