एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी -गुलज़ार

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी...

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी 
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी 

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं 
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी 

दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में 
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी 

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है 
उन की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी

-गुलज़ार 

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