राजनीति का डीएनए

Sep 23 2015 05:12 AM
राजनीति का डीएनए

राजनीति मे आजकल कुछ भी संभव है। कुछ लोग डीएनए पर सवाल उठा रहे है तो कुछ डीएनए सैंपल भिजवा रहे है। वैसे राजनीति मे डीएनए की चर्चा ही बेमानी है, क्योकि आज की राजनीति तो विभिन्न विचारधाराओ का विशाल समुच्चय है, जिसमे चमचावाद, अवसरवादिता, जातिवाद और भ्रष्टाचार की सरणीया आकार अपना गंदला जल मिलाती है। आज राजनीति मे समाजवाद, गांधीवाद, साम्यवाद और आदर्शवाद के शुद्ध शास्त्रीय गायन की गुंजाइश नही रही है। वह आलाप की साधना और नेतिकता रूपी सूरो की समझ की जरूरत नही बची है अब।

हमारे मोहल्ले के भइयाजी की नजरों मे तो आज की राजनीति मात्र रीमिक्स गायकी है, जिसमे बोल किसी और के है, धुन किसी और की। अपनी तो सिर्फ नकल है और नकल का मोलिकता और प्रतिभा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नही है। मैं जब उनसे मिला तो मेने कहा भइयाजी इन दिनो राजनीति मे डीएनए की चर्चा जोरों पर है। इस पर वे बोले बेकार है यह बहस। धनबल और बाहुबल ने पूरी राजनीति के जींस की संरचना को ही बिगाड़ दिया। पहले राजनीति शरीफो का काम था आजकल शोहदों का काम रह गया है और तुम चले हो डीएनए जांचने।

असल में आजकल रिश्तो में इतने गहरे षड़यंत्र फ़ुफ़कारने लगे है की लोग तुरंत डीएनए की जाँच पर उत्तर आए है। एक सभ्य समाज में यदि बात-बात पर डीएनए जांच की मांग तूल पकड़ने लगे तो उस समाज की दरकती दीवारो और खोखली नीव का अंदाज़ा तुरंत ही लगा लेना चाहिए। एक वो समय था जब लोग प्राण जाए पर वचन न जाये की हुंकार भरते थे और आज साफ मुकर जाते है अपने वचनो से। मनुष्य की जुबान की गति भले ही एफएम से तेज हो गई है लेकिन उसकी प्रतिष्ठा कम हो गई है। यह डीएनए का उद्घोष भी राजनीति में बढ़ते कोलाहल और अहंकार का गर्जन ही है। राजनीति में प्यार, पुचकार और मनुहार की जगह ललकार का स्पेस बढ़ गया है।

भइयाजी ठहरे पुराने आदमी, उन्हें जातियों और क्षेत्रो की अस्मिता को अपनी प्रतिस्पर्धा में घसीटना नही सुहाता। लेकिन उनको समझाना भी कठिन है की इन दिनों राजनीति भी हाईटेक हो गई है। वह आकर्षक नारो, धांसू पंचलाइने और ग्लैमर के तड़के की तलाश नित जारी रहती है।वोट खींचने का यही प्रभावी तरीका है। ये टोटके समकालीन राजनीति की मांग है। राजनीति की डगर आसान तो कब थी, लेकिन इन दिनों इसमें बहुत से पोंचेख़म है। नित नए फॉर्मूले खोजने पड़ते है। पब्लिक का मूड भांपना पड़ता है। एक सफल मदारी वही होता है जो डुगडुगी बजकर अपना कार्यकाल पूरा कर ले और दमन पर दाग भी न आए। और झोली भी खली न रहे।

संदीप मीणा