ढलती शाम

उतना ही मैं बुरा हूँ मैं
जितना तुम सोच सकते थे
या बेहतर उतना
जितना कि हो सकता था

वो सरकता रहा धीमे-धीमे
वक़्त था; करता भी क्या
और मैं उसके हर पल में
बदलता रहा आहिस्ता-आहिस्ता

जब गिरेबां में झाँक-कर देखा
ख़ुद को थोड़ा अलग पाया
फ़र्क करता भी तो कैसे
रक़ीब या दोस्त; हर-एक इंसान ही था

फुरक़त के लम्हों में देखे
जो चंद ख़्वाब थे
पतझड़ के पत्तों की मानिंद
बस झड़ते रहे; बरसते रहे

ढूंढे भी नहीं मिलती
क़दमों से ग़ायब आहटें
और मैं नासमझ
अपने साये को खोजता हूँ

चाहकर भी 'तुम' बनना नहीं चाहता
क्यूँ बनूँ इतना कठोर
खुश हूँ अब भी ये जानकर
कि चोट महसूस करता हूँ

हर बात के मायने वैसे
अनगिनत हो सकते हैं
जब 'सहर' होने को होती है
मैं 'शाम' ढलते देखता हूँ !

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