अश्क़ों को आँखों में ही थाम लिया

अश्क़ों को आँखों में ही थाम लिया

श्क़ों को आँखों में ही थाम लिया जाये
कुछ देर हसरतों को आराम दिया जाये
बातें तमाम सोचते गुजर गयी रात
इस जहन को कम काम दिया जाये
किसको फ़िक्र है अपनी किसको एहतराम
बढ़के आगे जिंदगी से इंतकाम लिया जाये
दस्तक जब होगी मौत की जब ही मरेंगे
कुछ वक्त को खुद को क्यों न गुमनाम किया जाये
बहारें ढुढ़तीं है गुल और गुलिस्तां 
खुद को ही सजा के गुलफाम किया जाये
इश्क ने समेट ली खुशियाँ हमारी
रहने का कहीं और इंतजाम किया जाये