जन्म बांग्लादेश में, लेकिन कर्म हिन्दुस्तान में, जानिए स्वतंत्रता सेनानी बिपिन चंद्र पाल के बारे में...

नई दिल्ली: महान स्वतंत्रता सेनानी बिपिन चंद्र पाल का नाम भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित है. वे एक वीर भारतीय क्रांतिकारी थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही थी. साथ ही वे लाल-बाल-पाल की तिकड़ी में से भी एक थे. विपिनचंद्र पाल राष्ट्रवादी नेता होने के साथ-साथ ही एक शिक्षक, पत्रकार, लेखक व वक्ता भी थे और उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों के जनक के नाम से भी पहचाना जाता है. आज विपिनचंद्र पाल के पुण्यतिथि पर आइए जानते है उनसे जुडी कुछ खास बातें...
 
कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में उन्हें दाखिला दिलाया गया था, मगर वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और उन्होंने एक हेडमास्टर के रूप में अपना करियर शुरू किया. बाद के सालों में, वह कलकत्ता के सार्वजनिक पुस्तकालय में एक लाइब्रेरियन के तौर पर काम करने लगे थे. 1898 में वह तुलनात्मक विचारधारा का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए थे. किन्तु एक वर्ष के बाद वे वहां से भारत लौट आए और तब से उन्होंने स्थानीय भारतीयों के बीच स्वराज के विचार की भावना का प्रचार करना शुरू कर दिया.

बिपिनचंद्र पाल, ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से मशहूर देशभक्तों की तिकड़ी के रूप में प्रसिद्ध थे और ये तीनों ने बंगाल के 1905 के विभाजन में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के खिलाफ पहला लोकप्रिय उदय शुरू करने के लिए भी जिम्मेदार बताए जाते हैं. ख़ास बात यह है कि पाल, महात्मा गांधी के राजनीति में प्रवेश से पहले आये थे और बिपिनचंद्र पा ‘वंदे मातरम’ पत्रिका के संस्थापक भी थे. विपिनचंद्र पाल ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों के दौरान खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया था और एक अकेले जीवन जीया. आज ही के दिन साल 1932 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.

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