भारतीय दर्शन पर एक नज़र

भारत में दर्शन का प्रादुर्भाव वैदिक काल से ही है ! वैदिल काल में वेदों तथा उपनिषदों की रचना हु़ई! यह माना जाता है कि वेद किसी मानव द्वार लिखित ग्रंथ नहि है ये वो ज्ञान है जो स्व्यं भगवान ने चार ऋषियों को सुनाया था ! वेद ईश्वर की वाणी है ! वेद का अर्थ ज्ञान होता है ! वेदो की संख्या चार बताईं गयी है :
1. ऋग्वेद 
2. यजुर्वेद 
3. सामवेद 
4. अथर्ववेद 
 ऋग्वेद में देवताओं की स्तुति से संबंधित मंत्रों का संकलन है , यजुर्वेद में यज्ञ की विधियों का वर्णन है , सामवेद संगीत से संबंधित है तथा अथर्ववेद जादू-टोना , तन्त्र-मन्त्र से संबंधित है !
वैदिक काल के बाद के काल को हम महाकाव्य काल भी कह सकते है जिस में रामायण तथा महाभारत जैसे महाकव्य लिखे गये थे ! जैन तथा बौद्ध धर्मो का विकास भी इसी काल में हुआ था ! 
उसके बाद के काल में भारतीय दर्शन के षड्‌-दर्शन का विकास हुआ ! इस काल को सूत्र काल कहा जाता है! तथा अभी समसामयिक काल में  कई  समाज सुधारक तथा चिंतक हुए है जिनमें राजा राममोहन राय, राधाकृष्णन, विवेकानंद तथा महात्मा गाँधी का नाम आता है ! 
         भारतीय दर्शन को दो भागो में बाँटा जा सकता है - आस्तिक एवम्‌ नास्तिक दर्शन ! यहाँ आस्तिक शब्द का अर्थ ईश्वर में विश्वास करने से नहि है और ना ही नास्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास न करने से है ! आस्तिक का अर्थ है जो वेदो में विश्वास रखता है या उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार करता है तथा नास्तिक का अर्थ है जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नही करता है !  चार्वाक दर्शन, जैन दर्शन तथा बौद्ध दर्शन को नास्तिक दर्शन माना जाता है जबकि षड्‌-दर्शन यानि न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग तथा मीमांसा-वेदांत को आस्तिक माना जाता है !
        यदि आस्तिक और नास्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास रखने और ईश्वर में विश्वास ना रखने से ले तो चार्वाक , मीमांसा तथा सांख्य नास्तिक एवम्‌ बाकी आस्तिक में आयेंगे ! मीमांसा तथा सांख्य अनिश्वरवादी है फिर भी ये वेदो कि प्रामाणिकता को ठुकराते नही है !
       यदि आस्तिक और नास्तिक का अर्थ परलोक में विश्वास रखने या ना रखने से लिया जाए तो चार्वाक को छोड़ के बाकी सब आस्तिक माने जाते है , केवल चार्वाक ही ऐसा दर्शन है जो परलोक में विश्वास नही रखता !
       भारतीय दर्शन में केवल चार्वाक दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है जो हर तरह से नास्तिक है !

 

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