सिख धर्म गुरु द्वारा दिए '५ ककार ' से सम्बंधित नियम और महत्व, जाने यहाँ

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी तक, हर किसी ने मानवता एवं एकेश्वरवाद का पाठ पढ़ाया है। सिख धर्म के ग्यारहवें स्वरूप ‘गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में ना केवल सिख गुरुओं की, वरन् हिन्दू तथा मुस्लिम संत-कवियों के उपदेश भी शामिल हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी के हुक्म अनुसार सभी सिख गुरु ग्रंथ साहिब जी को ही अपना गुरु मानते हैं। जागती ज्योति गुरु ग्रंथ साहिब जी के अलावा, गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों को ‘पांच ककार’ भी देकर गए हैं। यह एक पूर्ण सिख द्वारा धारण किए जाते हैं। एक ऐसा सिख जिसने गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा प्रदान किए गए ‘खंडे बाटे’ का अमृत पान किया हो और नियमानुसार सिख धर्म का पालन कर रहा हो।

इसे हम आम बोलचाल की भाषा में ‘अमृत चखना’ या ऐसे व्यक्ति को ‘अमृतधारी सिख’ भी कहते हैं, जिसके कुछ नियम होते हैं। इसके साथ अमृतधारी सिख पांच ककार भी धारण करता है, जो इस प्रकार हैं – कंघा, कड़ा, कच्छहरा (कच्छा), किरपान (कृपाण), केस (बाल)। यह कोई साधारण कंघा नहीं होता, केवल लकड़ी का कंघा होता है। यह अलग-अलग रंगों में एवं आकार में उपलब्ध होता है। जिस समय पर एक सिख को ‘अमृतधारी सिख’ बनाया जाता है, उस समय उसे एक कंघा अर्पण किया जाता है। जिस समय बालों को शैम्पू करने जैसा कोई चलन नहीं था, उस जमाने में एक सिख बालों को पानी एवं तेल की सहायता से ही साफ रखते थे। लेकिन दिन में कम से कम दो बार लकड़ी के कंघे से बालों को साफ करते थे। आज भी एक अमृतधारी सिख दिन में दो बार – सुबह और शाम को लकड़ी के कंघे से बालों को साफ जरूर करता है। अब आते हैं अगले ककार पर, जो है कड़ा। एक सिख के लिए ये एक मान-सम्मान से कम नहीं है। अमूमन सभी सिखों के दाहिने हाथ में आप यह कड़ा अवश्य देखते होंगे। यह कड़ा दाहिने हाथ में पहना जाए और केवल एक ही कड़ा पहना जाए, यही नियम है। लोहे के कड़े को सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। कहते हैं यह कड़ा एक सिख को कठिनाईयों से लड़ने की हिम्मत प्रदान करता है, सिख को किसी प्रकार का कोई भय नहीं होने देता।

 

जिस तरह के अंदरूनी वस्त्र आम लोग पहनते हैं, यह कच्छहरा उससे काफी अलग है। परंपरा है कि यह कच्छहरा सूती कपड़े का ही होना चाहिए। इस कच्छहरे को एक खास उद्देश्य से बनाया गया था। उस जमाने में जब सिख योद्धा युद्ध के मैदान में जाते थे तो घुड़सवारी करते समय या युद्ध करते समय उन्हें एक ऐसी चीज की जरूरत थी जो तन को भी ढके और परेशानी भी ना दे। आज के समय में भी एक अमृतधारी सिख कच्छहरा पहनता है। इसकी सहायता से आसानी से चला जा सकता है, यह बेहद आरामदायक होता है और ‘सेवा’ करते समय भी कोई परेशानी नहीं होती। केश या बाल, सिख धर्म में होने की पहचान है। गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुसार केश ‘अकाल पुरख’ द्वारा एक सिख को दी गई देन है, एक सम्मान है जिसे कभी भी खुद से अलग नहीं करना चाहिए। इसलिए एक अमृतधारी सिख या कायदे से किसी भी सिख को अपने बाल नहीं कटवाने चाहिए। यहां केश केवल सिर के बाल नहीं, वरन् पूरे शरीर के बाल हैं। सिर के, दाढ़ी के या शरीर के जिस भी भाग पर बाल हैं, उन्हें काटने या हटाने की मनाही है। शायद कभी आपने ध्यान भी दिया हो, एक अमृतधारी सिख हर समय अपने कमर की बाईं ओर एक छोटी सी किरपान या कटार पहने रखता है। यह पांच ककारों में से ही एक ककार है, जिसे 24 घंटे पहने रखना जरूरी होता है, यहां तक कि सोते समय भी। अगर स्नान किया जा रहा है, तो उस समय इस किरपान को सिर पर पगड़ी के साथ बांध लिया जाता है, लेकिन कभी भी अपने तन से अलग नहीं किया जाता। गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा था कि एक सिख को हर समय हिंसा से लड़ने के लिए हथियार पास में रखना चाहिए, लेकिन यह किरपान सिर्फ और सिर्फ रक्षा के लिए ही निकाली जाए, इसे गलत कारणों से उपयोग नहीं किया जा सकता।

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