चिड़चिड़ापन और अहंकार दूर करेगी यह साधना

By Mahendra Patidar
Sep 05 2015 01:37 AM
चिड़चिड़ापन और अहंकार दूर करेगी यह साधना

राहुल गांधी की वजह से चर्चा में आये विपश्यना साधना हालांकि कोई नया शब्द नहीं है। यह एक विशिष्ट प्रकार की ध्यान पद्धति है, इस पद्धति का विकास बौद्ध धर्मगुरुओं और साधकों द्वारा किया गया है। सामान्य भाषा में विपश्यना को जाने तो इसका संबंध सांस, विचार, भाव और क्रियाओं के जागृत स्वरूप से है। दूसरे शब्दों में विपश्यना को अपने आपको महसूस करने की एक प्रक्रिया है। अपने अस्तित्व को जागृत चेतना के साथ महसूस करना सही अर्थों में स्वयं को जानने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। यदि व्यक्ति अपने मन के सूक्ष्म स्तर से अपने भावों और अपनी क्रियाओं को पहचान लेता है, तो वह उसे कुंठा, मानसिक अशांति, चिड़चिड़ेपन और चिंता से उबरने में सहायता करती है।

साधना की प्रक्रिया- यह प्रक्रिया शांत भाव से आरामदायक मुद्रा में बैठकर की जाती है इसमे साधक को सांसों के उतार व चढ़ाव पर ध्यान केंद्रित करना होता है। फिर बंद आंखों से ही धीरे-धीरे अपनी ही सांसों की आवाजाही को जागृत भाव से महसूस करना होता है। ज्यादातर लोग अधिकतर क्रियाओं को इसलिए कर लेते है क्योंकि वह उसके बारे में जानते है, इस साधना से सांस जैसी एक महत्वपूर्ण क्रिया को जानने समझने और महसूस करने जैसी प्रक्रिया से शुरू होती है और गहन स्तरों तक लेकर जाती है।

अहंकार से मिलेगा छुटकारा- विपश्यना साधना के द्वारा अहंकार को दूर करने के बाद स्वयं को जानने का रास्ता बताता है क्योंकि स्वयं को जानने के लिए सांसारिक उपलब्धियों के अहंकार की परत को मन से उखाड़ कर फेंक देना होता है।

साधना के तरीके- प्रशिक्षित गुरु द्वारा ही विपश्यना की साधना को प्रभावोत्पादक माना गया है। विपश्यना की साधना एक अनुकूल स्थान होना चाहिए और कपड़े आरामदायक होना चाहिए इतना ही नहीं व्यक्ति का संकल्प इसमे सबसे जरुरी है। व्यक्ति जिस मुद्रा में अपने आप को आरामदायक स्थिति में महसूस करे, उसी स्थिति में या आसन में बैठे सकते है। स्थान एकांत में होना चाहिए जिससे एकाग्रता भंग न हो सके। अधिक समय तक साधना का संकल्प मन में कई तरह के विचार उत्पन करता है इस लिए शुरुवात में काम समय के लिए साधना करे और फिर धीर-धीरे आप साधना की अवधि बड़ा सकते है।