ज्ञानवापी मुद्दे पर जिसने इतिहास के रथ पर चढ़ने का किया प्रयास वो है रथ और उसका वाहक व्यास परिवार

हिन्दुत्व, हिन्दू और हिन्दुवाद सभी एक दुसरे के शब्दों की भिन्नता के बावजूद एक ही रहे, और हमेशा एक ही रहने वाले है। उसी तरह प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर (ज्ञानवापी मस्जिद) और उसके आसपास की संपत्तियों पर ज्ञानवापी के व्यास परिवार का मालिकाना हक था। जिस हिन्दुत्व की विकासवाद वाली राजनीति के अंतर्गत व्यास परिवार को ज्ञानवापी के मुद्दे से अलग-थलग कर नया कानूनी जामा पहनाने का प्रयास भी किया जा रहा है उसकी सफलता में संशय है।

ज्ञानवापी मुद्दे पर जिस इतिहास के रथ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे है, वो रथ और उसका वाहक व्यास परिवार ही है जिसे आज महत्वहीन समझकर दुर्दिन देखने को मजबूर किया है। जिस तरह हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार में आदिगुरू शंकराचार्य जी का योगदान अतुलनीय था, उसी तरह इंडियन सनातन परम्परा को पूरे देश में प्रसारित करने के लिए इंडिया के चारों कोनों में स्थापित 4 मठों मे से एक श्रृंगेरी शारदा पीठ स्थापना से पुर्व शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य शास्त्रार्थ की भी बहुत चर्चा देखने के लिए मिली है। मंडन मिश्र कितने बड़े विद्वान थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाने वाला है कि उनके घर का पालतू तोता भी संस्कृत का श्लोक बोलता था। मंडन मिश्र आदिगुरूशंकराचार्य से शास्त्रार्थ में पराजित हो शिष्य बन कर संन्यासी हो गए और उनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा और वही श्रृगेरी के प्रथम शंकराचार्य बन चुके है।

वो मंडन मिश्र जिनकी विद्वता और योग्यता इतनी उच्चकोटि थी कि शास्त्रार्थ में हराने के उपरांत भी आदिशंकराचार्य जी महाराज ने श्रृंगेरी पीठ का प्रथम मठाधीश भी बना दिया है। ऐसे ‘शास्त्रार्थ पुरुष’ विद्वान की पहचान को विद्वानों और शास्त्रार्थ की नगरी में इस तरह फेंका गया जैसे वो किसी मुगल आततायी की कब्र भी है। काशी के प्राचीन धरोहरों में एक विश्वनाथ मंदिर के पास ऐतिहासिक भवन जिसे लोग “व्यास-भवन” के नाम से भी जानते थे, उस भवन का अस्तित्व विकास की बाढ़ में धराशायी हो चुका है। भवन में स्थापित मंडन मिश्र की प्रतिमा की जो स्थिति हुई वो शर्मनाक करने वाली है। वर्तमान वक़्त मे प्रतिमा के अस्तित्व पर कोई बोलने वाला नहीं। जिस भवन में चारों पीठों के शंकराचार्यों की विशेष स्‍मृतियां हो, जिस भवन में कभी जॉर्ज पंचम सहित जहां देश के पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोग आकर काशी की प्राचीनता से इंटरव्यू कर चुके हो, उस भवन को बेदर्दी से जमींदोज करना कहां का विकास हुआ है। ‘व्‍यास भवन’ सिर्फ एक मकान नहीं था, यह अपने आप में काशी का इतिहास, संस्कृति व सभ्यता की एक अलग ही पहचान थी।

जिसको संरक्षित करने की आवश्यकता थी, आज सीविल इंजीनियिरिंग इतना उन्‍न्‍त हो चुका है कि इससे भवन को संरक्षित ही किया जा रहा है,  क्‍या सनातन धर्म को मानने व जानने वालों के लिए व्‍यास भवन कोई मायने नहीं रखने वाला है,?? क्या सनातन धर्म को मानने वाले के युवा पीढ़ियों को अपनी संस्कृति व सभ्यता को जानने व देखने का अधिकार अब तक नहीं दिया है ? क्‍या काशी का विकास उसकी सभ्यता व संस्कृति को मिटा कर क्योटो बनाने के उपरांत ही होने वाला है?? आज व्यास भवन जमींदोज हो गया लेकिन विद्वानों, साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों की नगरी मानी जानी वाली काशी से एक आवाज नहीं उठी, क्या यही है जिंदा शहर की पहचान, जहां उसकी विरासत को समाप्त कर चुके है।

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