जन्मदिन विशेष : श्री श्री रविशंकर ने दिया जीवन को जीने का मूल मंत्र

सफेद वस्त्र धारण किए दाढ़ी और कुछ लंबे बालों वाले सन्यासी का मुस्कुराता हुआ फोटो आपने अक्सर देखा होगा। जब भी कभी लोगों को ऐसा लगे कि आपकी कोई समस्या आपके जीवन से बड़ी हो रही हैं। आपको उन समस्याओं से निजात मिलने का कोई उपाय नज़र नहीं आ रहा है तो फिर आप के लिए आर्ट ऑफ लिविंग समस्याओं की कुंजीबनकर सामने आता है। क्या आप जानते हैं क्या है आर्ट ऑफ लिविंग और हम जिस सन्यासी की बात कर रहे हैं वह कौन है।

जीवन की कठिन बातों को बड़ी आसानी से सामने रखने वाले इस धवल वस्त्र धारी सन्यासी की आज मांग बनी हुई है। कहीं भी इस सन्यासी के पहुंचते ही लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं, तो तो कोई बस हाथ जोड़कर ही रह जाता है। दक्षिण भारत के प्रमुख महानगर जहां हर वक्त सड़कों पर हॉर्न बजाती गाड़ियां दौड़ा करती हैं वही पर है इस सन्यासी का शांति स्थल जहां अद्भुत शांति है, अपनापन है हर समस्या का समाधान है।

जिस सन्यासी की बात हम कर रहे हैं उसका जन्म 13 मई वर्ष 1956 में दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ था। इस प्रतिभावान बालक का नाम उसके माता - पिता ने रखा रविशंकर। बालक के पिता का नाम वेंकटरत्नम् था। उनकी माता श्रीमती विशालाक्षी एक सुशील महिला थीं। रविशंकर जी का नाम आदि शंकराचार्य से प्रेरित होकर रखा गया। बालक रविशंकर इतने प्रतिभावान थे कि उन्होंने 4 वर्ष की आयु में ही उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक कंठस्थ थे।

वे इसका व्याख्यान भी करते थे। उनके गुरू गांधीवादी श्री सुधाकर चतुर्वेदी रहे लेकिन बाद में उनके पिता ने उन्हें महर्षि महेश योगी को समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा की फीजिक्स की स्नातक उपाधि 17 वर्ष में ही पूर्ण कर ली थी। रविशंकर जी अपने ज्ञान के कारण श्री महेश योगी के प्रिय शिष्य बन गए थे। मगर उनके नाम को लेकर लोकप्रिय सितार वादक रविशंकर ने आपत्ती ली और आरोप लगाया कि वे उनकी कीर्ति का उपयोग कर रहे हैं ऐसे में उन्होंने अपने नाम के आगे श्रीश्री लगाना प्रारंभ कर दिया।

आध्यात्मिक गुरू श्रीश्री रविशंकर जी को जीवन की समस्याओं को सुलझाने के ही साथ अपनी संस्था आर्ट ऑफ लिविंग और इसके तहत होने वाले सुदर्शन क्रिया योग के लिए भी जाना जाता है। दरअसल शिमोगा में वे एक बार 10 दिन के लिए मौन में चले गए। इस दौरान वे वहां नदी के किनारे बैठे थे इसी के तहत उन्हें कुछ अनुभव हुआ और लयबद्ध रूप में एक कविता की रचान उन्होंने की इसी आधार पर एक अद्भुत श्वास प्रणाली का निर्माण भी उन्होंने किया। आज यह क्रिया बहुत ही लोकप्रिय है।

वैज्ञानिक और चिकित्सकीय तौर पर भी इस क्रिया को प्रमाणित किया जा चुका है। इस क्रिया के माध्यम से यह ज्ञात हुआ है कि यह अद्भुत श्वास संयोजन है। आज यह क्रिया कई रोगों में कारगर है और कई देशों के लोग इस क्रिया को सशुल्क सिखते हैं। गुरूदेव श्रीश्री रविशंकर का शुल्क लेने का प्रयोजन है कि इस माध्यम से जरूरत मंदों के लिए कई तरह की गतिविधियों का संचालन किया जाता है।

यही नहीं श्रीश्री रविशंकर ने आर्ट ऑफ लिविंग के माध्यम से कई तरह के सेवा प्रकल्पों की स्थापना की और कई तरह के सेवा कार्य भी किए। आदिवासी क्षेत्रों में लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य हो, बच्चों की शिक्षा का काम हो, महिलाओं और अन्य लोगों को सिलाई आदि कार्यों के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का कार्य हो या फिर आपदा प्रबंधन के दौरान राहत पहुंचाने का कार्य हो आर्ट ऑल लिविंग ने हर मोर्चो पर शानदार कार्य किया है।

आज यह संस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रही है, यह संस्था विश्व के 152 देशों से भी अधिक देशों में काम कर रही है। यह संस्था करीब 370 मिलियन लोगों के जीवन को शानदार बना चुकी है। श्रीश्री ने कई बार शांति के लिए कार्य भी किया। कर्नाटक सरकार ने उनहें कृष्णदेवराय राज्याभिषेक की 500 वीं वर्षगांठ पर स्वागत कमेटी का सभापति चुना गया।

श्री श्री को वर्ष 2016 में भारत सरकार ने पद्विभूषण अलंकर से सम्मानित किया। यह देश के शीर्ष अलंकरणों में से एक है। श्री श्री रविशंकर जी ने अपने ज्ञान से योग, आध्यात्म, शांति, सफल जीवन का अलख जगाया। यही नहीं सामान्यरूप से उन्होंने जीवन जीने की कला विकसित की जिसका लाभ आज के दौर के कई परिवारों को मिल रहा है श्री श्री रविशंकर अपने अनुयायियों में श्री श्री के नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम का मूल मंत्र अपनाते हुए विश्वभर के लोगों के जीवन का छुआ। यही नहीं उन्होंने आतंकियों को भी शांति के रास्ते पर चलने का संदेश दिया और उनकी प्रेरणा से कुछ आतंकियों ने हथियार डाले और वे समाज की मुख्य धारा में आ गए। 

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