खुशी से ऐसे गुजारें दायित्व की इस पर्व को मिट जाऐं सारे भेद-भाव

Aug 28 2015 06:43 PM
खुशी से ऐसे गुजारें दायित्व की इस पर्व को मिट जाऐं सारे भेद-भाव

यूं तो रक्षाबंधन खुशी, हर्षोल्लास का पर्व है जिसमें सभी अपने परिवारों के साथ त्यौहारी व्यंजनों और मिठाईयों का आनंद लेते हैं लेकिन यह एक ऐसा पर्व है जो बहन और भाई के अटूट प्रेम का प्रतीक है। इस पर्व में बहनों को उनकी रक्षा का वचन तो मिलता ही है साथ ही बहनों से जुड़े उनके दायित्वों को पूरा करने का वचन भी भाई देते हैं। यह पर्व आज के दौर में बहुत ही प्रासंगिक है। दरअसल ऐसा समय जब परिवारों में विभाजन हो रहे हों, लोग बुजुर्गों की जिम्मेेदारियां उठाने से बच रहे हों और लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़ देतो हों वहां इस पर्व के बड़े मायने हैं।

दरअसल विवाह के बाद कुछ परिवारों से जब बहनें या बेटियां विदा होती हैं तो वे जाते समय थाली में रखे पवित्र धान्य को बतौर समृद्धि घर में बिखेरकर जाती हैं। ऐसे में वे अपने माता - पिता का दायित्व अपने भाईयों पर छोड़कर जाती हैं। इस दौरान जब भाई अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें दुख होता है लेकिन जब वे अपने माता पिता को सम्मान देते हैं और उनके साथ अपनत्व के भाव से रहते हैं तो परिवार खुशियों से चहक उठता है।

यह आयोजन भाई और बहनों को याद दिलाता रहता है कि उनके एक दूसरे के प्रति कुछ दायित्व हैं और उन्हें जीवनभर उसे पूरा करते रहना है। यह पर्व परिवारों को एक दूसरे से जोड़ता है। हालांकि वर्तमान दौर में यह बात भी देखने को मिली है कि विवाह के बाद बहुऐं अपनी ननंद से और ननंद अपनी भाभियों से मनमुटाव रखती हैं। जिसके कारण परिवारों में वैमनस्य पैदा होने लगता है। सभी मन से एक दूसरे से दूर होने लगते हैं।

रक्षाबंधन के पर्व पर भी कई बार छोटी - छोटी बातों को लेकर सभी एक दूसरे से मनमुटाव रखते हैं। दरअसल यह पर्व साथ बैठकर अपने पलों को खुशी से गुजारने का है। आत्मीयता से मिलने का है । यह वह पर्व है जिसमें सभी परिवार के सदस्य एक दूसरे के साथ रहते हैं और हर खुशी और गम को साझा करते हैं जिससे आने वाले समय में भी उनका रिश्ता बेहद अच्छा बना रहता है।

जो बहुएं परिवार में आती हैं उन्हें भी यह ध्यान रखना चाहिए कि आखिर वे किसी की बेटी और बहन रही हैं यदि उनके मायके में भी ऐसा ही व्यवहार होगा तो वे किस तरह का अनुभव करेंगी इसलिए उन्हें भी अपने सास - ससुर और नंदन से पिता, माता और बहन की तरह ही व्यवहार करना चाहिए। जिससे परिवार में सभी के बीच आपसी प्रेम बना रहे।