CAA-370 के खिलाफ केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल बने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, एक नज़र उनके मुकदमों पर..
CAA-370 के खिलाफ केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल बने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, एक नज़र उनके मुकदमों पर..
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नई दिल्ली: वरिष्ठ वकील और कांग्रेस की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रह चुके कपिल सिब्बल को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) का अध्यक्ष चुना गया। सुप्रीम कोर्ट निकाय के चुनाव आज (16 मई) को हुए। इससे पहले 8 मई को सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का ऐलान किया था। उनकी जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों के लिए बड़ी जीत बताया। हालाँकि, कपिल सिब्बल ने 2021 में कांग्रेस से किनारा कर लिया था। दरअसल, सिब्बल कांग्रेस में संगठनात्मक सुधार की वकालत कर रहे थे, जो कई पुराने कॉंग्रेस्सियों को पसंद नहीं आ रहा था। सिब्बल, गुलाम नबी आज़ाद के G-23 समूह का हिस्सा बन गए थे, जो कांग्रेस में सुधार चाह रहा था। उनका कहना था कि, पार्टी गांधी परिवार से आगे भी सोचे, लेकिन ये कहना सिब्बल को भारी पड़ गया था और उनके घर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पथराव तक कर दिया था।  

इसके बाद सिब्बल ने कांग्रेस छोड़ दी थी, लेकिन उनकी विचारधारा तो वही रही। वे समाजवादी पार्टी (सपा) के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे और अब SCBA अध्यक्ष बने, तो कांग्रेस ने उन्हें सबसे पहले बधाई दी। आखिर, तमाम विपक्षी नेताओं को जेलों से बाहर सिब्बल ही तो निकालते हैं और अदालतों में कांग्रेस के साथ तमाम विपक्षी दलों का जमकर बचाव भी करते हैं। उन्हें बधाई देते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने लिखा कि, "कपिल सिब्बल को हाल ही में भारी बहुमत से सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया है। यह उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों के लिए एक बड़ी जीत है। यह निवर्तमान प्रधान मंत्री के शब्दों में, परिवर्तनों का एक ट्रेलर भी है। यह बहुत जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर होगा। जल्द ही पूर्व शासन के कानूनी ढोल बजाने वालों और चीयरलीडर्स को झटका लगने वाला है।'' 

बता दें कि हार्वर्ड लॉ स्कूल से स्नातक सिब्बल 1989-90 के दौरान भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल थे। उन्हें 1983 में वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया गया था। 1995 और 2002 के बीच, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने तीन बार SCBA अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वरिष्ठ वकील आदिश अग्रवाल वर्तमान में SCBA  के अध्यक्ष हैं। शीर्ष अदालत ने पहले निर्देश दिया था कि SCBA की कार्यकारी समिति में कुछ पद महिला सदस्यों के लिए आरक्षित किये जाएं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा था कि उसका मानना है कि SCBA एक प्रमुख संस्था है और देश के सर्वोच्च न्यायिक मंच का अभिन्न अंग है। इसने निर्देश दिया था कि बार की महिला सदस्यों के लिए आरक्षण होगा। पीठ ने कहा था कि आगामी 2024-2025 एससीबीए चुनावों में कार्यकारी समिति के कोषाध्यक्ष का पद महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा। हालाँकि, कपिल सिब्बल जितने वरिष्ठ वकील हैं, उतने ही विवाद भी उनके साथ जुड़े हैं। कपिल सिब्बल का नाम किसी मजलूम, गरीब, या पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए उतना नहीं जाना जाता, जितना भ्रष्ट नेताओं को बचाने के लिए जाना जाता है। लालू यादव, आज़म खान, मुख़्तार अंसारी, जैसे कई नेताओं के लिए सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में अपनी वकालत का जोर दिखा चुके हैं, फ़िलहाल वे जमीन घोटाले में घिरे झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन को जेल से बाहर निकालने के लिए कोशिशें कर रहे हैं, जिनकी जमानत याचिका कई बार ख़ारिज हो चुकी है

अयोध्या मामले में बने सुन्नी वक़्फ बोर्ड के वकील:-

सिब्बल ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से मुकदमा लड़ा था और पूरा जोर लगाया था कि, विवादित जमीन मुस्लिमों को ही दी जाए और वहां मस्जिद बने। वो सिब्बल (Kapil Sibal Controversial Cases) ही थे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस मामले की सुनवाई 2019 तक टाल दी जाए, क्योंकि इसका असर 2019 लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है। हालाँकि, सिब्बल यह मुकदमा हार गए थे और अदालत ने राममंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था। इससे पहले सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट के मामले में भी कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में भगवान श्रीराम को काल्पनिक भी बता चुके हैं। 

तीन तलाक लागू करने के लिए लड़े सिब्बल :-

जब भारत सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षित करवाने के लिए एक बार में तीन तलाक़ (Instant Triple Talaq) पर बैन लगा था। तब भी सिब्बल (Kapil Sibal Controversial Cases) ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की तरफ से इसे वापस लागू करवाने सुप्रीम कोर्ट गए थे और इसे आस्था का मामला बताकर इसमें छेड़छाड़ न करने की बात कही थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट में उनकी दलीलें नहीं चलीं और तीन तलाक़ पर कानून बना। बता दें कि, जो सिब्बल, तीन तलाक़ को आस्था का मामला बता रहे थे, वही अयोध्या मामले को आस्था का मामला मानने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रहे थे। 

CAA-NRC लागू करने का विरोध:-

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश के पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने वाले कानून नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और अवैध बांग्लादेशियों-घुसपैठियों को देश से बाहर निकलने वाले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का विरोध करते हुए भी कपिल सिब्बल (Kapil Sibal Controversial Cases) सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ चुके हैं। उनका कहना है कि, ये दोनों कानून लागू नहीं होने चाहिए, क्योंकि ये असंवैधानिक हैं। 

370 वापस लागू करने के लिए लड़े कपिल सिब्बल :-

कपिल सिब्बल ने जम्मू कश्मीर में अलग संविधान को मान्यता देने वाले अनुच्छेद 370 को वापस लागू करने के लिए भी काफी लंबी लड़ाई लड़ी थी। लेकिन वो ये मुकदमा हार गए। 370 न केवल पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता देने के दरवाजे खोलता था, बल्कि आतंकवाद को भी बढ़ावा देता था। उससे भी अधिक, ये अनुच्छेद दलितों के लिए एक अभिशाप था, जिसके लिए किसी दलित शुभचिंतक ने आवाज़ नहीं उठाई। दरअसल, कई विपक्षी दल अपने आप को दलित हितैषी भी बताते हैं और 370 वापस लागू करने की बात भी करते हैं। लेकिन, वो ये बात अच्छी तरह जानते है कि, 370 दलितों के लिए कितना बड़ा छलावा था। अनुच्छेद 370 और 35 A के तहत राज्य में सालों से रह रहे दलितों, वंचितों को वहां की नागरिकता तक नहीं मिली थी, जिसके कारण ये लोग न तो घाटी में संपत्ति खरीद सकते थे, न विधानसभा चुनाव में वोट डाल सकते थे और सबसे गंभीर बात तो ये है कि, जम्मू कश्मीर में यह नियम था कि, दलितों की संतानें कितनी भी पढ़ लें, मगर फिर भी उन्हें मैला ही उठाना होगा, उन्हें नौकरी मिलेगी तो केवल सफाईकर्मी की, इसके अलावा नहीं। ये अपने आप में हैरान करने वाली बात है कि, 370 को वापस लागू करवाने की मांग करने वाली तथाकथित राजनितिक पार्टियां अपने आप को दलित हितैषी बताती हैं। यहाँ ये भी गौर करने वाली बात है कि, जहाँ कश्मीर में दलितों के साथ ये भेदभाव था, वहीं कोई भी पाकिस्तानी, कश्मीरी महिला से शादी करके वहां का नागरिक बन सकता था और तमाम लाभ ले सकता था। इसी कारण घाटी में आतंकवाद भी जमकर पनप रहा था। 

चारा घोटाले में लालू यादव को दिलाई जमानत:-

सालों तक चली सुनवाई में बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव को अदालत ने चारा घोटाले में दोषी करार देते हुए जेल की सजा सुनाई थी। जिसमे अधिकतर समय लालू बीमार होने के नाम पर जेल में न रहकर अस्पताल में भर्ती रहे। लेकिन कपिल सिब्बल (Kapil Sibal Controversial Cases) ने हाई कोर्ट में यह कहकर उन्हें जमानत दिलवा दी कि, उन्होंने अपनी सजा के 45 महीने पूरे कर लिए हैं , जबकि लालू को 5 साल की सजा सुनाई गई थी। सिब्बल के कारण ही लालू हिरासत से बाहर आए थे। 

आज़म खान को दिलवाई राहत:-

समाजवादी पार्टी (सपा) के बड़े नेता आज़म खान जब, जौहर यूनिवर्सिटी के लिए जमीन कब्जाने सहित कई मामलों में फंस गए तो कपिल सिब्बल उनके लिए संकटमोचक बनकर सामने आए और सुप्रीम कोर्ट से जमानत दिलवाकर उन्हें जेल से बाहर करवाया। 

स्कूलों में हिजाब पहनने की भी कर रहे वकालत:-

गत वर्ष कर्नाटक का हिजाब मामला सबको याद ही होगा, जब कुछ मुस्लिम लड़कियों ने कक्षा के अंदर हिजाब पहनने की जिद पकड़ी थी। जबकि स्कूल, कॉलेज के प्रशासन का कहना था कि, शिक्षण संस्थानों में केवल यूनिफार्म ही चलेगा। कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी यूनिफार्म वाली बात को सही मानते हुए फैसला सुनाया था।  लेकिन, कपिल सिब्बल (Kapil Sibal Controversial Cases), मुस्लिम लड़कियों के वकील बनकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और उन्हें कक्षा के अंदर हिजाब-बुर्का पहनने देने की वकालत की। तीन तलाक़ को लागू करने की मांग करने वाले सिब्बल, यहाँ महिला सशक्तिकरण के साथ खड़े नज़र आए थे और कक्षा में हिजाब पहनने को आस्था का मुद्दा बताया था, वही आस्था जो उन्होंने राम मंदिर मामले में दरकिनार कर दी थी। शायद सिब्बल साहब को आस्था एक ही पक्ष में दिखती है, आश्चर्य नहीं होगा, यदि वे ज्ञानवापी मामले में भी सुप्रीम कोर्ट में विरोध करते नज़र आएं।

अब वही कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए हैं, ये निकाय शीर्ष अदालत में वकालत करने वाले वकीलों से संबंधित है, जो कई बार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों का भी विरोध कर देता है। अब भारत की न्याय व्यवस्था क्या करवट लेती है, ये वक़्त ही बताएगा।

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