ओह तो इस तरह की मनुष्य ने हँसने की शुरुआत

tyle="text-align:justify">जापान में हंसने को लेकर एक रिसर्च सामने आई है. यह रिसर्च जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा की गई है. रिसर्च बंदर, जापानी लंगूर, चिम्पांजी और मानव जाति के बच्चों को लेकर की गई है. रिसर्च के मुताबिक हंसने की उत्पत्ति करीब 30 मिलियन वर्ष पहले हो चुकी है. हंसी के अस्तित्व का कारण विश्व के सभी पुराने बंदर और हमारे पूर्वजों में भिन्ताएं दिखने को माना गया है.
 
रिसर्च में सामने आया है कि मानव जाति और चिम्पांजी के बच्चे के उंघने से चेहरे पर एक भाव पैदा होता है जो कि उनके चेहरे पर एक हंसी के भाव को दर्शाता है. बता दें कि इन चेहरें के भावों से पैदा होने वाली इस 'सहज हंसी' को ही हंसी के अस्तित्व की शुरुआत माना गया है.
 
जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता मास्की तोमोंगे का कहना है कि हमने पाया कि लगभग एक दशक पहले चिम्पांजी के बच्चे भी एक सहज हंसी को अपने चेहरे पर दर्शोते थे. तोमोंगो ने आगे कहा कि हंसने की उत्पत्ति करीब 30 मिलियन वर्ष पहले हो चुकी है. जब विश्व के सभी पुराने बंदर और हमारें पूर्वजों में भिन्ताएं दिखने लगी थी. बता दें कि क्योटो यूनिवर्सिटी में एक हेल्थ चेक-अप के दौरान लंगूर के बच्चे को भी हंसते हुए पाया गया था. रिसर्च मे यह भी सामने आया कि करीब 7 लंगूर के बच्चों ने 58 कम से कम एक बार में चेहरे पर सहज हंसी के भाव छोड़े.
 
रिसर्च में एक और बात सामने आई है, जिससे हंसी को लेकर एक विरोधाभास की स्थिति पैदा होती है. दरअसल रिसर्च में यह भी बताया जा रहा है कि चिम्पांजी और इन जापानी बंदरो में जो हंसी के भाव देखे गए है जरुरी नहीं है कि इन भावों में 'सहज हंसी' के भाव प्रकट होते है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस सहज हंसी से मनुष्य, चिम्पांजी और बंदरो के गालो की मांसपेशियों मे विकास होता है. वहीं कुतों में भी इस हंसी के भाव को देखा गया है. अंतत: शोधकर्ता मास्की तोमगो ने कहा कि हंसी के अस्तित्व की कहानी इन जानवरो के भावों से ही शुरु हई है.

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