जलियांवाला बाग हत्याकांड : फिर हरे हुए यादों के जख्म

आजादी के आन्दोलन की कुछ तारीखें ऐसी हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता. इन्हीं में से एक है पंजाब में अमृतसर का जलियाँ वाला बाग हत्याकांड. 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर द्वारा निहत्थे मासूमों पर की गई गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गये थे और हजारों घायल हो गये थे. कुछ जान बचाने के लिए पास के कुँए में कूद गये थे. 97 साल बाद आज फिर यादों के जख्म हरे हो गए हैं  

इतिहास पर नजर डालें तो पता लगेगा कि पंजाब प्रशासन को जब यह जानकारी मिली कि आन्दोलनकारी जलियांवाला बाग में एकत्रित हो रहे हैं ,तो उसने दमन का रास्ता अपनाया और  सबक सिखाने की ठान ली थी. मार्शल ला की घोषणा कर सैनिकों की अतिरिक्त टुकड़ी पहले ही बुला ली गई थी. 11 अप्रैल की रात को जनरल डायर के नेतृत्व में यह टुकड़ी अमृतसर पहुंची थी. उधर 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन आन्दोलनकारियों ने जलियाँ वाला बाग में सभा रखी थी. जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे.

कर्फ्यू के बीच आसपास के सैकड़ों लोग बैसाखी पर शहर घूमने और मेला देखने आये थे और सभा का सुनकर जलियाँ वाला बाग पहुँच गए थे.सभा शुरू होने से पहले ही 10 -15 हजार लोग जमा हो चुके थे. तभी इस बाग कर एकमात्र रास्ते से जनरल डायर टुकड़ी के साथ घुसा और बगैर किसी चेतावनी के गोलीबारी शुरु कर दी. बाग में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गई थी.जिसमें सैकड़ों अहिंसक सत्याग्रही शहीद हो गये थे और हजारों घायल हो गये थे. घबराहट में कई लोग बाग के कुँए में कूद गये.बाग में लाशों का ढेर लग गया था. इसी बर्बरता ने ब्रिटिश राज की नींव हिला दी थी.

उधर जनरल डायर ने उच्च अधिकारियों को झूठ बोल दिया कि उस पर भारतीयों की फ़ौज ने हमला कर दिया था इसलिए बचाव में गोलियां चलाना पड़ी थी. इस पर ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर मायकल ओ डायर ने इसे अनुमोदित कर दिए जाने से जनरल डायर बच गया था. इस हत्याकांड की विश्वव्यापी निंदा होने पर गठित हंटर कमीशन की 1920 में रिपोर्ट आने पर  जनरल रेजिनाल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल तो बनाया भी साथ ही भारत में पोस्ट न देने का भी फैसला लिया गया था और ब्रिटेन भेज दिया था.

ब्रिटेन के हाउस आफ कामन्स में डायर का निंदा प्रस्ताव पारित हुआ लेकिन हॉउस आफ लार्ड ने प्रशंसा कर प्रशस्ति प्रस्ताव पारित कर दिया ,लेकिन विश्व व्यापी निंदा के आगे झुकते हुए आखिर ब्रिटिश सर्कार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और जनरल डायर को इस्तीफा देना पड़ा था. भले ही इस घटना को करीब सौ साल होने को है लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की क़ुरबानी लगता है कल की ही बात है. जो हमारी यादों में बसी हुई है.

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