दुष्कर्म मामलों में मृत्युदंड, कितना कारगर ?

नई दिल्ली: देश में महिलाओं के होने वाले यौन अपराधों को रोकने के लिए सरकार ने कई कड़े कानून बना रखे हैं, लेकिन इसके बावजूद इन जघन्य अपराधों में कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है. हाल ही में कठुआ-उन्नाव और इंदौर रेप केस पर देश में उठे जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने पॉक्सो एक्ट में संशोधन किए हैं, जिसमे 12 वर्ष से कम उम्र की कन्या के साथ बलात्कार करने पर फांसी की सजा हो सकती है. लेकिन क्या मौत की सजा इस तरह के अपराधों को रोक सकेगी, क्योंकि फांसी का प्रावधान तो 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद ही कर दिया गया था.

अगर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट को देखे तो पता लगता है कि बच्चों के साथ हो रहे यौन अपराधों में 95 % आरोपी परिचित ही रहते हैं, ऐसे में बच्चों की जान को भी खतरा हो सकता है, आरोपी रेप करने के बाद उनकी हत्या भी कर सकता है, या फिर हो सकता है आरोपी घर का ही कोई हो और मामले को आगे ही न बढ़ने दे. क्योंकि इतनी कम उम्र के बच्चे खुद तो पुलिस थाने जाकर शिकायत नहीं कर सकते. उन्हें शिकायत करने के लिए परिजनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

इस बारे में  कुमाऊं विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहे डॉ. प्रभात कुमार उप्रेती कहते हैं कि अपराधी यह सोच कर व्यवहार नहीं करता कि उसे फांसी लगेगी या नहीं. वह एक उन्मादी और बीमार इंसान की तरह व्यवहार करता है. न्याय व्यवस्था का मकसद होता है ऐसे अपराधी में सुधार लाना, लेकिन मृत्युदंड इंसानों में सुधार की संभावना को ही खत्म मान लेना है. डॉ उप्रेती का कहना है कि बलात्कार की मुख्य वजह है नैतिकता का पतन और गन्दी मानसिकता, अगर हमे इस तरह के अपराधों को रोकना है तो हमे देश के नैतिक स्तर को ऊपर उठाना होगा, सिर्फ मृत्यदंड से काम नहीं चलेगा. 

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