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जोड़ने वाले योग को तोड़ने की बात कितनी उचित
जोड़ने वाले योग को तोड़ने की बात कितनी उचित

भारतीय दर्शन आध्यात्म प्रारंभ से ही योग की बात करता रहा है, योग मतलब जो भी पदार्थ बना है वह जिन मूल पदार्थों से बना है उन्हें जोड़कर संतुलित करना। भारतीय आध्यात्म सदैव से ही सभी को जोड़ने की बात करता है। इसलिए हमारी संस्कृति में वसुधैव कुटंबकम् को महत्व दिया गया है। इसका अर्थ है सारे जीव जगत को हम अपने साथ लेकर आगे बढ़ें। भारतीय आध्यात्म में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात कही गई है। इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को योग के साथ भी देखा जाता है। हमारे शारीरीक तत्वों को संतुलित कर मन, बुद्धि, शरीर को बराबर रखना और उसके माध्यम से मार्ग आसान करना योग का एक महत्वपूर्ण कार्य है। आज के दौर में योग को स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक देखा गया है।

वैसे योग में चैतना का समावेश भी होता है। जी हां, चेतना। जिसे जागृत और संतुलित कर व्यक्ति मीलों दूर मौजूद किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क साध सकता है।कुंडलिनी जागरण से अपनी आत्मा को इतना चेतन्य कर सकता है कि वह बैठे बैठे जो विचार करे वह कर सकता है। हालांकि यह योग के एक अन्य ध्यान से जुड़ा है लेकिन आज जिस अर्थ में योग को लिया जा रहा है, यदि उस संदर्भ में बात करें तो योग बेहद उपयुक्त साधन है।

अपने शरीर को पुष्ट, चुस्त, लचीला और स्वस्थ्य बनाए रखने में योग बेहद अहम भूमिका निभाता है। क्या कभी आपने विचार किया है कि सेल से चलने वाले किसी कैल्युलेटर के बंद हो जाने पर कभी - कभी उसे धूप में रख दिया जाता है और कुछ देर बाद कैल्क्युलेटर चलने लगता है। जब शरीर को ठंड लगती है तो सूरज की धूप आराम देती है, यही नहीं जैन मान्यता के कुछ संत तो सूर्य स्नान कर अपने शरीर को शुद्ध करते हैं। ऐसे में उनके शरीर के सारे किटाणु नष्ट हो जाते हैं।

मगर वर्तमान में जिस तरह का राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है उसमें योग को ही तोड़ दिया गया है। यानि जिसे सभी को जोड़ने के लिए बनाया गया उसे ही तोड़ दिया गया। एक वर्ग के लिए योग से सूर्य नमस्कार को अलग कर दिया गया। सूर्य जिन्हें ईश्वर की उपमा दी जाती है। जो जीवनीय उर्जा प्रदान करते हैं। उनके सामने झुकने भर से इंकार करने पर सूर्यनमस्कार को योग से अलग करना कितना उचित है यह एक सवाल बनकर सामने खड़ा है। इस योग को आध्यात्म की सीमाओं से बाहर निकालकर बड़े स्वरूप में देखने की जरूरत है। इस तरह के प्रयासों के बाद हम सच्चे अर्थों में विश्व को सनातन दर्शन देने में सफल होंगे।

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