आप ही सहेजनी होगी अपनी धरोहर

Apr 22 2015 04:10 PM
 
हम वर्ल्ड अर्थ डे तो मनाते हैं लेकिन अर्थ पर जीवन सहेजने के अर्थ को भूल रहे हैं। हालात ये हैं कि हम हर दिन जीवनहीन पृथ्वी के भयावह स्वप्न की ओर बढ़ते जा रहे हैं, मगर इस दिशा में कदम उठाने की पहल नहीं कर रहे, आखिर क्यों, दरअसल बड़े पैमाने पर लोगों का सोचना होता है कि इस तरह के काम तो सरकार के हैं, सरकारों को ही जनजागरूकता अभियान चलाकर कुछ प्रयास करने होंगे, ऐसे में धरती पर पारिस्थितिकी संतुलन सहेजने की बात हम कैसे समझ पाऐंगे, मगर यह सब हमारी ही भागीदारी से संभव है। जब हम सब मिलकर एक - एक कदम बढ़ेंगे तभी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हजार कदम आगे बढ़ा जा सकेगा। 

 हर मोर्चे पर जरूरी पहल 

दरअसल पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक कई ऐसे तत्व हैं जिनका आज हृास हो रहा है। यदि हम बात करें जल की तो इसकी दशा तो बहुत ही खराब है। तालाब से नदियों तक और नदियों से हमारे घरों तक जल संपदा कहीं प्रदूषण की शिकार है तो कहीं इसका अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है। अब तो हमने भू- जल के क्षेत्र में भी हद कर दी है, सैकड़ों हजारों फीट तक धरती का सीना चीरने के बाद हमें बमुश्किल कुछ पानी मिल पाता है। इसके बाद भी हम जल संकट की परेशानी को नहीं समझ पा रहे हैं। 

 बिन पानी सब सून 

जल संपदा की बर्बादी को लेकर एक बात सामने आती है कि रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। जी हां, जल हमारे सभी के जीवन में बेहद उपयोगी हैं बिना पानी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जहां पहले हमारी अधिकांश नदियां सालभर पानी से लबालब रहती थीं वहीं अब इनमें से अधिकांश नदियां गर्मी के मौसम की शुरूआत होते ही सूखने लगती हैं, हमेशा बहने वाली मां गंगा का पानी भी अब अशुद्ध होता जा रहा है। वह गंगा जो करोड़ों की आस्था का केंद्र है अपना अस्तित्व खोते जा रही है। गंगोत्री ग्लेशियर के सिमटने की बात कोई नई नहीं है। हर साल इस ग्लेशियर का आकार बदल रहा है। यह बेहद चिंता की बात है, मध्यप्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली मां नर्मदा से प्रदेश में विकास की आस लगाई जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि नर्मदा नदी के कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां गर्मी की शुरूआत होते ही जलस्तर में कमी आने लगती है। 

पिंजरे में दिख जाता है शेर 

अपने बच्चों को गाय के बछड़े की तरह शेर और अन्य जंगली जीव दिखाने की चाहत में हम इनके प्राकृतिक आवासों को नष्ट करते जा रहे हैं। रही सही कसर शेर, हाथी आदि जीवों के अवैध शिकार से पूरी हो रही है। हालांकि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम और अन्य कानूनों से इस तरह की बातों पर कुछ रोक लगी है लेकिन बीते कुछ वर्षों में शेरों की मौत से मामला गंभीर होता जा रहा है। शेरों की कुछ नस्लें तो ऐसी हैं जो विलुप्ति की कगार पर है। 

हाईब्रिड/फर्टिलाईजर से नुकसान 

हाईब्रिड और फास्ट क्राॅप प्रोडक्शन के इस दौर में हम फसलों से आवश्यक तत्व छिन रहे हैं। कई तरह की फसल को एक साथ मिलाकर हम नया प्रोडक्ट तो प्राप्त कर रहे हैं लेकिन यह लंबी अवधि के लिए बेहद नुकसानदायक माना जाता है। दूसरी ओर केमिकल फर्टिलाईजर के लगातार उपयोग से खेती की जमीन कड़क और बंजरनुमा होती जा रही है। इस तरह के प्रयोग के कारण अब किसानों को खेती में नुकसान नज़र आ रहा है और वे अपने खेत बेच रहे हैं। 

इन खेतों पर सीमेंट - कांक्रीट के जंगल विकसित हो रहे हैं। ये सभी कारण हैं जिनके चलते हम अपनी पारिस्थितिकी को खुद ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। जल्दबाजी और सुविधायुक्त जीवन जीने के लालच में हम अपने जीवन की उस डगाल को ही काटते जा रहे हैं जिस पर हम खुद खड़े हैं, मगर यह जानने के बाद भी सभी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो संभव है कि पृथ्वी भी ऐसे ग्रहों में शामिल हो सकती है जिस पर लोग जीवन के संभावित निशान तलाशते नज़र आते हैं।