आध्यात्मिक चेतना का पर्व है सिंहस्थ कुंभ

यह सिंहस्थ कुंभ बहुत ही धार्मिक व आध्यात्मिक चेतना को जाग्रित करने वाला पर्व है। आध्यात्मिक चेतना के जाग्रित होने से मानवता, त्याग, सेवा, उपकार, प्रेम, सदाचरण, अनुशासन, अहिंसा, सत्संग, भक्ति-भाव अध्ययन-चिंतन परम शक्ति में विश्वास आदि आदर्श गुणों की उत्पत्ति होती है।

हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन की पावन नदियों के तट पर कुंभ महापर्व में भारतवासियों की आत्मा, आस्था, विश्वास और संस्कृति का समावेश होता है।

धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है की जब देवताओं एवं दानवों के बीच समुद्र मंथन था तभी अनमोल रत्नों के साथ अमृत कुंभ भी निकला। इस अमृत कुंभ को स्वर्ग में सुरक्षा रूप से पहुंचाने की जिम्मेदारी इन्द्रपुत्र जयंत को सोंपी गयी थी। इस शुभ कार्य में सूर्य, चंद्र, शनि एवं बृहस्पति ने बड़ा योगदान दिया। अमृत कुंभ स्वर्ग तक ले जाते समय देवताओं को राक्षसों का चार बार सामना करना पड़ा । इन चार हमलों के दौरान देवताओं द्वारा अमृत कुंभ पृथ्वी के चार स्थानों पर पर रखा गया। उन चार स्थानों कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

यह चार स्थान हरिद्वार, प्रयाग, त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन हैं। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हरिद्वार, प्रयाग, त्र्यंबकेश्वर, उज्जैन स्थानों के अलावा अन्य किसी भी स्थान पर कुंभ मेला नहीं लगता।

भारतीय संस्कृति, आस्था और विश्वास के प्रतीक इस कुंभ का उज्जैन के लिये केवल पौराणिक कथा का आधार ही नहीं, बल्कि काल चक्र या काल गणना का वैज्ञानिक आधार भी है। भौगोलिक दृष्टि से अवंतिका-उज्जयिनी या उज्जैन कर्कअयन एवं भूमध्य रेखा के मध्य बिंदु पर अवस्थित है।

भारतीय संस्कृति के सम्पूर्ण दर्शन हमें धार्मिक मेले और पर्व में ही दिखाई देते है । सिंहस्थ पर्व पर सर्वाधिक आकर्षण साधुओं का आगमन, निवास एवं विशिष्ट पर्वों पर बड़े उत्साह, श्रद्धा, प्रदर्शन एवं समूहबद्ध सहित क्षिप्रा नदी का स्नान है। लाखों की संख्या में दर्शक एवं यात्रीगण इनका दर्शन करते हैं. और इनके स्नान करने पर ही स्वयं स्नान करते हैं। इन साधु-संतों व उनके अखाड़ों की भी अपनी-अपनी विशिष्ट परंपराएँ व रीति-रिवाज हैं।

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