मानव जीवन का परिष्कार करना है पर्यूषण पर्व

Sep 12 2015 05:55 PM
मानव जीवन का परिष्कार करना है पर्यूषण पर्व

श्वेतांबर और दिगंबर जैन समाज में इन दिनों पर्युषण पर्व की धूम है। यह पर्युषण पर्व जैन समाज के लिए बहुत महत्व रखता है। दरअसल समाज को इस पर्व में अपने संतों का दुर्लभ सान्निध्य प्राप्त होता है। यह वह अवसर है जब तप, आराधना के साथ संतों का सत्संग मिलता है। चातुर्मास का व्रत लेकर संत जिस स्थान पर होते हैं वहीं अपना डेरा डाल लेते हैं और अपने तप से समाज को ज्ञान का आलोक देते हैं। दूसरी ओर समाज के अनुयायी संतों की आराधना करते हैं सामान्य व्रत व पूजन करते हैं जिससे उन्हें शारीरीक शक्ति और मानसिक सुख प्राप्त होता है।

यह पर्व इन्हें क्रोध से बचना, अपरिग्रह आदि के बारे में बताता है। इस व्रत के दौरान जैन लोगों को क्षमावणी की शिक्षा दी जाती है। जैन लोग क्षमा करने के माध्यम से जीवन से क्रोध को दूर कर सभी को अपना लेते हैं। विभिन्न व्यक्तियों के अंतःकरण में ऐसा भाव रहता है जिसमें कहा जाता है कि प्रत्येक कार्य में ज्ञान का आलोक जगे। पद प्रतिष्ठा का मान र हे। सभी का सम्मान किया जाए तो यह मार्दव के माध्यम से सीखने को मिलता है।

इस पर्व के तहत आर्जव में व्यक्ति क्रोध और अहंकार को त्याग देता है। सुख से जीने की कला सीखी जाती है। शौच में क्रोध, अहंकार के साथ छल-कपट को दूर किया जाता है। सत्य में सत्य को अपनाता है साथ संयम में इंद्रयों और मन की चंचलता पर नियंत्रण की बात की जाती है। तप और त्याग से जीवन का सुख पाने के बारे में बताया जाता है।