विरासत बचाने, भविष्य संवारने की दुविधा में उलझा किसान

Mar 14 2015 01:04 AM
विरासत बचाने, भविष्य संवारने की दुविधा में उलझा किसान
करें राष्ट्र निर्माण बनाऐं मिट्टी से अब सोना। यह गीत आपने कहीं न कहीं सुना ही होगा। दरअसल वास्तव में देश की मृदा इतनी उपजाऊ है कि किसान का पसीना इस माटी में गिरने के बाद फसल बनकर लहलहाता है और यही फसल पकने के बाद बाजार में सोने के दाम में बिकती है। जिससे किसान अपना घर और परिवार चलाता है। मगर सदियों से गरीब, मेहनती कहा जाने वाला किसान अब अपनी इस जमीन के लिए भी संघर्ष करता नज़र आ रहा है। जी हां, पहले जहां किसान साहूकार, जमींदार के डर से जीता था वही अब भूमि अधिग्रहण बिल से डरा हुआ है। किसान को चिंता है कि कहीं अचानक उससे जमीन न छीन ली जाए और फिर उसे जमीन के बदले में वाजिब मुआवज़ा मिले या न मिले इस बात में संशय है। 
 
आखिर भूमि अधिग्रहण बिल के प्रावधान ही कुछ ऐसे हैं, कि किसान अपनी जमीन सरकार द्वारा अधिगृहित किए जाने पर विरोध नहीं कर पाएगा। हालांकि सरकार द्वारा अधिगृहण पर किसान को वाजिब मुआवजा दिया जाएगा लेकिन वह किस अनुपात में दिया जाएगा यह तय नहीं है। प्रावधान में सरकार द्वारा प्रभावित परिवार के सदस्य को नौकरी दिए जाने की बात की गई है लेकिन उसे नौकरी किस तरह से और अधिकतम कितनी अवधि में मिल जाएगी इस बात में संशय है। मगर सरकार द्वारा किसानों के हित में किए जाने वाले इस तरह के प्रावधानों को संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल में शामिल किया जाएगा इसमें संशय है हालांकि सरकार ने विपक्ष की बात मानकर बिल के मसौदे को किसान हितैषी बनाने का आश्वासन दिया है। 
 
मगर भूमि अधिग्रहण बिल संसद में लाए जाने की बातों से ही किसानों की हालत पस्त हो रही है। जी हां, भारतीय कृषि को सदैव से ही मौसम का जुंआ कहा जाता है। प्रतिवर्ष देश के किसी न किसी भाग में अतिवृष्टि, अनावृष्टि की परेशानी से किसान परेशान रहता है। यही नहीं खेती में फसल लगाने के बाद बेमौसम बारिश, अधिक सर्द और ओलावृष्टि से किसान को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। यही नहीं किसान खेती किसानी की अपनी जरूरत के लिए, कृषि यंत्र खरीदने के लिए कई बार ऋण भी लेता है। जिसके बोझ की मार उसे झेलनी ही पड़ती है। कई ऐसे सामाजिक अवसर होते हैं जब किसान को खुलकर खर्च करना पड़ता है मगर फसल बर्बादी और माली हालत के चलते किसान पर ऋण की दोहरी मार पड़ती है और वह कर्ज के दोहरे बोझ से लद जाता है।
 
जिसे उतारने के लिए वह जीवनभर प्रयास करता है मगर चाहकर भी उतार नहीं पाता। मगर इसके बाद भी जब गांव की धूलभरी पगडंडियों से होकर किसी बड़े तीर्थ स्थल का रास्ता जाता है तो किसान शहरी बाबू के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ता। इस राह से गुजरने वाले सूट - बूट वाले शहरवासियों को छांव, पेयजल, भजन मंडली सबकुछ मिलता है। जब एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए लंबी दूरियों को मिनटों में पाटना होता है तब भी किसान अपना कलेजा चीरकर अपनी अमूल्य धरोहर विकास के नाम कर देता है। जी हां, ऐसी अमूल्य धरोहर जिसे वह सदियों से मां का नाम देता आया हो। लेकिन बावजूद इसके वह अपने जीवन का सबसे बड़ा त्याग कर देता है।
 
वर्तमान में शहरों के आसपास तेजी से शाॅपिंग माॅल, टाउनशिप्स, रिसाॅर्ट, होटल, मल्टीप्लेक्स का निर्माण होता है। लोग यहां आकर मनोरंजन करते हैं। यह सारा मनोरंजन वे ही लोग कर पाते हैं जिनकी जेब बहुत भारी होती है, मगर मोटी जेब वालों को मनोरंजन का साधन उपलब्ध करवाने के लिए इसी किसान को समझौता करना पड़ता है। 
जी हां, किसान अब अपने गांव की मिट्टी में वह नमी नहीं पाता है, अब किसान को अपने बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है। किसान अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए गांव की शांत आबो - हवा से दूर व्यवस्थित शहर में जा बसा है। अब किसान खुद भी मौसमी जुंआ नहीं खेलना चाहता। मगर फिर भी उसे अपनी जमीन से प्यार है।
 
वह पसोपेश में है कि आखिर क्या करें। सियासतदार उसे माटी का पुतला समझकर कभी एक ओर तो कभी दूसरी ओर खींच रहे हैं, भोला किसान हैरान है। उसके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि पुरखों की दी हुई विरासत को संभाले या अपने बच्चों के भविष्य को संवारे। मगर फिर भी किसान अपनी धरती से प्यार करता है। वह आज भी उसी गांव से रूखसत होना चाहता है जहां की मिट्टी में खेलकर उसका बचपन बीता है।