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दलितों को वोटिंग-नौकरी का हक़ नहीं, कश्मीर का अलग संविधान ! क्या ऐसा 370 फिर लागू होना चाहिए ? आज 'सुप्रीम' फैसला
दलितों को वोटिंग-नौकरी का हक़ नहीं, कश्मीर का अलग संविधान ! क्या ऐसा 370 फिर लागू होना चाहिए ? आज 'सुप्रीम' फैसला

नई दिल्ली: अनुच्छेद 370 हटाए जाने के चार साल बाद, सुप्रीम कोर्ट आज सोमवार, 11 दिसंबर को जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ फैसला सुनाएंगे। 

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के कारण किसी भी तनाव और संभावित संघर्ष के लिए जम्मू-कश्मीर में तैयारियां की जा रही हैं, जबकि देश भर के राजनीतिक नेता इस मामले पर अपनी राय दे रहे हैं, विपक्ष अभी भी अनुच्छेद 370 की वापसी पर जोर दे रहा है, जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता है। अनुच्छेद 370 और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 को निरस्त करने को चुनौती देने वाली कई याचिकाएँ, जिन्होंने पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया था - को 2019 में एक संविधान पीठ को भेजा गया था। पांच न्यायाधीशों की पीठ, सीजेआई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एसके कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत 16 दिनों से याचिकाकर्ताओं और केंद्र की दलीलें सुन रहे थे। शीर्ष अदालत ने पांच सितंबर को इस मामले में अपना फैसला 11 दिसंबर के लिए सुरक्षित रख लिया था।

दलितों के साथ सबसे बड़ा छलावा था 370:-

बता दें कि, जो कांग्रेस और सपा एक तरफ अपने आप को दलित हितैषी भी बताती है और 370 वापस लागू करने की बात भी करती है। वो ये अच्छी तरह जानती है कि, 370 दलितों के लिए कितना बड़ा छलावा था। अनुच्छेद 370 और 35 A के तहत राज्य में सालों से रह रहे दलितों, वंचितों को वहां की नागरिकता तक नहीं मिली थी, जिसके कारण ये लोग न तो घाटी में संपत्ति खरीद सकते थे, न विधानसभा चुनाव में वोट डाल सकते थे और सबसे गंभीर बात तो ये है कि, जम्मू कश्मीर में यह नियम था कि, दलितों की संतानें कितनी भी पढ़ लें, मगर फिर भी उन्हें मैला ही उठाना होगा, उन्हें नौकरी मिलेगी तो केवल सफाईकर्मी की, इसके अलावा नहीं। ये अपने आप में हैरान करने वाली बात है कि, 370 को वापस लागू करवाने की मांग करने वाली तथाकथित राजनितिक पार्टियां अपने आप को दलित हितैषी बताती हैं। यहाँ ये भी गौर करने वाली बात है कि, जहाँ कश्मीर में दलितों के साथ ये भेदभाव था, वहीं कोई भी पाकिस्तानी, कश्मीरी महिला से शादी करके वहां का नागरिक बन सकता था और तमाम लाभ ले सकता था। इसी कारण घाटी में आतंकवाद भी जमकर पनप रहा था। इन धाराओं से जम्मू कश्मीर को अलग संविधान मिल गया था, जिसमें मनमाफिक संशोधन करके इस्तेमाल किए जाते थे। 

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