कभी कभी छोटो की सीख बड़ों के लिए कारगर सिद्ध होती है

सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह थे जो सिख धर्म के नौंवे 'गुरु तेगबहादुर' के ही पुत्र थे। जब गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ था. उस वक्त उनके पिता तेगबहादुर असम में थे। गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना में हुआ था। तेगबहादुर अपने पुत्र गुरु गोविंद सिंह से पहली बार तब मिले जब वे 4 वर्ष के हो चुके थे। पुत्र के जन्म के पहले ही जब वे बाहर जाने लगे तो उन्होने अपने इस होने वाले बच्चे का नाम प्रस्तावित कर दिया था उन्हीं के कहे अनुसार उनका नाम 'गोविंद राय' था बचपन से ही गोविंद राय का स्वभाव अपने हम उम्र बच्चों से अलग था ।

क्योकि जब बच्चे खिलौनों से खेला करते थे, उस समय गोविंद राय तलवार, कटार और धनुष चलाना सीख रहे थे। उन सभी बच्चो से उनका स्वभाव बिलकुल अलग था उनकी सोच बहुत उचाइयों तक जाती ओर वे बहुत ही बड़े बड़े कार्य कर दिखाते। आपको बता दें की बिहार की राजधानी पटना में एक गुरुद्वारा है जिसका नाम है 'भैणी साहब'। इस गुरुद्वारे में आज भी बालक गोविंद राय के छोटे-छोटे खड़ाऊं, कपड़े, कटार औऱ छोटा सा धनुष-बाण देखे जा सकते हैं। पटना में ही रहते हुए गोविंद राय ने संस्कृत, अरबी और फारसी की शिक्षा प्राप्त की थी।

एक बार की बात है जब मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचारों से कश्मीरी पंडित पीड़ित थे। उस मुगल शासक औरंगजेब के द्वारा धर्म के नाश और अत्याचार से परेशान होकर गुरु तेगबहादुर की शरण में पहुंचे तब गुरु तेगबहादुर ने कहा, इस हो रहे अत्याचार को दूर करने के लिए ऐसे व्यक्तियों को सजा देने के लिए किसी महान आत्मा की आवश्यकता है जो अपनी बुद्धि के प्रयोग से हिंदू धर्म की रक्षा कर सकता है ' उनकी बातों को सुन रहे पुत्र गुरु गोविन्द देव ने कहा पिताजी आपसे बड़ा महापुरुष इस संसार में कौन है?' उस समय गोविंद राय की आयु मात्र 9 वर्ष थी। और उन्होंने अपने पिता जी को साहस और विश्वाश दिलाया और उस हो रहे अत्याचार को दूर करने की बड़ी उत्तम सलाह दी थी . कई बार आपने भी देखा होगा की छोटो की सलाह भी बड़ों के लिए कारगर सिद्ध होती है.

 

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