माघ पूर्णिमा के दिन सम्पन्न हो जाएगा कल्पवास, आइए जानते हैं इसका अर्थ

आप सभी को बता दें कि हिंदू धर्म में माघ के महीने विशेष महत्व होता है और इस माह का नाम मघा नक्षत्र के नाम पर रखा गया है ऐसे में माघ के महत्व की बात करें तो इस मास में कल्पवास की बड़ी महिमा है. आप सभी को बता दें कि इस माह तीर्थराज प्रयाग में संगम के तट पर निवास को कल्पवास कहा जाता है. ऐसे में बहुत कम लोग हैं जो कल्पवास का अर्थ जानते हैं तो आइए हम आज आपको बताते हैं कल्पवास का अर्थ.

कल्पवास का अर्थ - आपको बता दें कि कल्पवास का अर्थ है संगम के तट पर निवास कर वेदों का अध्ययन और ध्यान करना माना गया है. कहते हैं कल्पवास धैर्य, अहिंसा और भक्ति का संकल्प होता है और इस दौरान प्रयागराज में हर साल माघ मेला लगता है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होते हैं. ज्योतिषों के अनुसार प्रयाग में कल्पवास की परंपरा सदियों से चली आ रही है और कल्पवास का समापन माघ पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद हो जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन प्रयाग में त्रिवेणी स्नान करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मोक्ष मिल जाता है.

मत्स्यपुराण के अनुसार - कहते हैं जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है और जो मोक्ष की अभिलाषा लेकर कल्पवास करता है उसे अवश्य मोक्ष मिलता है. अब इस बात पर यह सवाल मन में आता है कि कल्पवास क्यों और कब से चला आ रहा है. आप सभी को बता दें कि असल में कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है और कल्पवास का नियम हमारे यहां हजारों वर्षों से चला आ रहा है. मान्यता है कि जब इलाहाबाद तीर्थराज प्रयाग कहलाता था और यह आज की तरह विशाल शहर ना होकर ऋषियों की तपोस्थली माना जाता था और प्रयाग क्षेत्र में गंगा-जमुना के आसपास घना जंगल था. वहीं उस जंगल में ऋषि-मुनि ध्यान और तप करते थे और ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा. वहीं गृहस्थों को थोड़े समय के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी.

आप सभी को बता दें कि कल्पवास के नियम के अनुसार, इस दौरान जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आता है वह पत्तों और घासफूस से बनी हुई कुटिया में रहता है जिसे पर्ण कुटी कहा जाता है और इस दौरान दिन में एक ही बार भोजन किया जाता है व मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभाव का पालन करते थे. आप सभी को बता दें कि यहां झोपडिय़ों में रहने वाले कल्पवासी सुबह की शुरूआत गंगा स्नान से करते हैं और उसके बाद दिन में संतों की सत्चर्चा या सत्संग किया जाता है और देर रात तक भजन, कीर्तन चला करता है.

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