भारत में शिक्षक दिवस का महत्व, भगवान से भी ऊँचा है गुरु का दर्जा

हमारा देश युगों-युगों से इस धरती पर है. भारत की धरती एक ऐसी धरती है, जहां भगवान ने स्वयं अवतार लिया और इस देश की मिट्टी में उनका जीवन बीता. श्री राम और श्री कृष्ण इसके सबसे बड़े उदाहरण है. देवता होने के बाद भी श्री कृष्ण और श्री राम को अपने गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी और अपने गुरु के समक्ष भगवान श्री कृष्ण-भगवान श्री राम दोनों ही नतमस्तक नजर आए. यहीं कारण है कि भारतीय समाज में गुरु को भगवान से भी ऊँचा दर्जा प्राप्त है.

वर्ष के 365 दिनों में से कोई न कोई दिन किसी विशेष दिवस के रूप में मनाया जाता है और ऐसे ही 5 सितंबर का दिन भारत शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है. कहा जाता है कि प्रलय और निर्माण दोनों ही एक शिक्षक की गोद में पलते हैं, शिक्षा से भी अधिक महत्व एक शिक्षक का होता है. शिक्षक ही वह व्यक्ति होता है, जो हमारे जीवन का कायाकल्प करता है. इस संसार में जब एक बालक आता है, तो शुरुआती कुछ साल वह माता-पिता, घर-परिवार के बीच में गुजारता है. वहीं जब वह बोलने और चलने की स्थिति में आ जाता है तो उसे विद्यालय पहुंचाया जाता है और शुरू हो जाता है गुरु-शिष्य का एक नया अध्याय. वे शिक्षक ही होते हैं, जो हमारी दिशा और दशा दोनों तय करते हैं. 

कैसे हुई शिक्षक दिवस मनाए जाने की शुरुआत ?

महान दार्शनिक और देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. एक बार राधाकृष्ण के कुछ मित्रों और छात्रों ने उनके जन्मदिवस को मनाने की बात कही तब इस पर डॉ सर्वपल्ले ने कहा कि बेहतर होगा कि मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए. इस तरह से भारत डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानी कि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने लगा. 

 

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5 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस ?

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