आखिर क्यों मनाया जाता है विश्व जनसंख्या दिवस

भारत की निरंतर विस्फोटक होती जनसंख्या देश के सामने एक गंभीर चुनौती बनती चली जा रही है। गौरतलब है कि सीमित साधन में असीमित होती जनसंख्या का प्रभाव देश के विकास, खाद्यान्न व्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार, महंगाई एवं जन्म एवं मृत्यु दर जैसी मूलभूत बातों को बुरी तरह प्रभावित करने का काम कर रही है। ऐसा नहीं कि यह चुनौती इंडिया के लिए ही मुसीबत है, बल्कि दुनिया के तमाम देश इस दंश को झेलता हुआ आ रहा है। इसी आपदा से निपटने और नियंत्रण रखने के लिए 11 जुलाई को वर्ल्ड जनसंख्या दिवस के आयोजन की शुरुआत कर देई गई थी, लेकिन क्या भारत इससे किंचित लाभान्वित हुआ है? ‘नहीं’। आज हम भारत के परिप्रेक्ष्य में विश्व जनसंख्या दिवस पर बात करने वाले है, लेकिन पहले जानें इसका इतिहास क्या कहता है।

क्या है इसका इतिहास!: वर्ष 1987 में जब विश्व की कुल जनसंख्या 5 अरब के ग्राफ को भी क्रॉस कर चुकी है, तब संयुक्त संघ ने चिंता जताई। और तमाम देशों के सुझाव और सहमति के उपरांत 11 जुलाई 1989 को पहली बार विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया था। साथ ही संयुक्त राष्ट्र में बढ़ती आबादी पर नियंत्रण रखने और परिवार नियोजन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए एक वृहद कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व जनसंख्या दिवस को कामयाब  बनाने के लिए तमाम किस्म के कार्यक्रमों एवं मिशन शुरू करने की योजनाएं बनती और क्रियान्वित हो रही है।

भारत की चिंता: विश्व जनसंख्या दिवस के परिप्रेक्ष्य में इंडिया की चिंता बेमानी नहीं कही गई है, क्योंकि इंडिया के पास विश्व का सिर्फ 2 प्रतिशत भूभाग है, और 16 प्रतिशत की वैश्विक आबादी है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 और 2011 की जनगणना के मध्य देश में 18 फीसद आबादी में वृद्धि हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग के मुताबिक, यदि जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो अगले तीन वर्षों में भारत की आबादी लगभग 273 मिलियन होने वाली है, और 7 वर्षों बाद भारत चीन की आबादी को पीछे छोड़ देगा। विस्फोट होती जनसंख्या भारत के निम्न चिंताओं को रेखांकित करता है।

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