सरदार वल्लभभाई पटेल को क्यों कहा जाता है 'लौह पुरुष' ?

नई दिल्ली: दुनियाभर में लौह पुरूष के नाम से मशहूर सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्र भारत के प्रथम गृह मंत्री के रूप में सैकड़ों रियासतों को एक सूत्र में पैरोकार राष्ट्र का निर्माण करने में अहम योगदान दिया था। सरदार वल्लभभाई पटेल वकील के रूप में हर महीने हजारों रुपये कमाते थे। लेकिन उन्होने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए बकालत छोड़ दी। किसानों के एक नेता के रूप में उन्होने ब्रिटिश सरकार को हार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया। ऐसे बहादुरी भरे कामों के कारण ही वल्लभभाई पटेल को लौह पुरुष कहा जाता है।

562 रियासतों का एकीकरण करने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में हुआ था। जुलाई 1910 में वल्लभ भाई पटेल ने स्वयं इंग्लैंड जाकर मिडल टेम्पल में लॉ की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया और वहां उन्होने आधी समयावधि में ही अपना पूरा कोर्स कर लिया। सरदार पटेल नवम्बर 1917 में पहली बार गाँधी जी से सीधे संपर्क में आये, 1918 में अहमदाबाद जिले में अकाल राहत का बहुत व्यवस्थित ढंग से प्रबंधन किया। 1920 के असहयोग आन्दोलन में सरदार पटेल ने स्वदेशी खादी, धोती, कुर्ता और चप्पल अपनाये तथा विदेशी कपड़ों की होली जलाई। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। उस समय गुजरात का खेडा खण्ड भयंकर सूखे की चपेट में था और किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की थी। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिये प्रेरित किया। अंत में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गई यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत के लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है। 1950 में उनका देहान्त हो गया। सरदार पटेल के देहांत होने के बाद जवाहर लाल नेहरू का कांग्रेस के अन्दर बहुत कम विरोध शेष रहा था। 

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