पंजाब में बढ़ रहा दलित मजदूरों का यौन शोषण, बद से बदतर हो रहे हालात

अमृतसर: हरियाली से घिरे एक खेत में शब्बो आलू खोदने और उन्हें एक बोरे में एकत्रित करने में मगन है। सात दिन बाद उसे इस काम के लिए एक हजार रुपये दिए जाएंगे। इसके बाद एक बार वापस वह रोजी-रोटी की तलाश में लग जाएगी। अनपढ़ शब्बो को यह भी नहीं पता कि वह कितने वर्ष की है। जब उससे उसकी आयु के बारे में पूछा जाता है तो वह शर्माते हुए जवाब के लिए अपनी मां धीरो की तरफ नजर दौड़ाती है। उसकी विधवा मां भी कुछ नहीं बता पाती हैं। वह अनुमान लगाती हैं कि अमृतसर के सारंगदेव गांव की शब्बो की आयु 14 वर्ष होनी चाहिए। 

इसी तरह अशिक्षित और काफी गरीब हजारों महिला मजदूर पंजाब के खेतों में कार्य कर रही हैं। किन्तु देश की एक बड़े तबके के लिए आजीविका का सहारा बने हरे-भरे खेत यौन शोषण और दूसरे किस्म के दमन की दास्तां को छिपा लेते हैं, जिनकी चर्चा सिर्फ बंद दरवाजों के भीतर होती है। इन खेतों में कार्य करने वाली 92 फीसद महिलाएं दलित हैं। पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के एक शोधछात्र का कहना है कि आए दिन उन्हें शोषण से भरे माहौल में जबरदस्ती काम करना पड़ता है। 

एक अनुमान के अनुसार पंजाब में 15 लाख मजदूर खेतों में कार्य करते हैं। ग्रामीण और कृषि अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ प्रफेसर ज्ञान सिंह और उनकी टीम ने पंजाब के 11 जिलों के 1017 घरों से प्राइमरी डेटा एकत्रित किया है। अप्रैल 2019 में जारी किए गए उनके विश्लेषण के अनुसार यहां काम करने वाली 70 फीसद महिलाओं ने माना है कि उनका यौन शोषण हुआ किन्तु वे इस बारे में चुप थीं। इनमें से कई को जातिगत भेदभाव के कारण उत्पीड़न झेलना पड़ा। 

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