आखिर क्यों की जाती है नाबापत्रिका पूजा? जानें इसका महत्‍व

आज नवरात्रि का सप्तम दिन मतलब महासप्‍तमी है। महासप्तमी का आरम्भ नाबापत्रिका पूजा से आरम्भ होती है। नाबापत्रिका को नवपत्रिका भी कहा जाता है। नाबापत्रिका वंदना में नौ वृक्षों की पत्तियों को मिलाकर बनाए गए गुच्‍छे की वंदना की जाती है। इन नौ पत्तियों को मां दुर्गा के नौ स्‍वरूपों का प्रतीक माना जाता है। नाबापत्रिका पूजा बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, असम, त्रिपुरा तथा मणिपुर में जबरदस्त रूप से मनाई जाती है।

नाबापत्रिका मतलब इन नौ पत्तियों को सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी के जल से स्‍नान कराया जाता है, जिसे महास्‍नान कहते हैं। तत्पश्चात नाबापत्रिका को पूजा पंडाल में रखा जाता है। इस वंदना को 'कोलाबोऊ पूजा' भी कहते हैं। है। आज के दिन कृषक भी नाबापत्रिका की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि नाबापत्रिका की वंदना से अच्छी फसल उगती है। नाबापत्रिका को भगवान गणेश की पत्नी भी माना जाता है। इसलिए पूजा के वक़्त इसे प्रभु श्री गणेश की प्रतिमा के दाहिनी तरफ रखा जाता है। 

नौ अलग-अलग वृक्षों के पत्तियां मिलाकर नाबापत्रिका तैयार की जाती है। इसमें हल्‍दी, जौ, बेल पत्र, अनार, अशोक, अरूम,  केला, कच्‍वी तथा धान के पत्तों का उपयोग होता है। नाबापत्रिका में उपयोग नौ पत्तियां मां दुर्गा के नौ स्‍वरूपों का प्रतीक मानी जाती हैं।  केले के पत्ते को ब्राह्मणी का प्रतीक माना जाता है जबकि अरवी के पत्ते मां काली के प्रतीक माने जाते हैं। इसी प्रकार हल्‍दी के पत्ते मां दुर्गा, जौ की बाली देवी कार्तिकी, अनार के पत्ते देवी रक्‍तदंतिका, अशोक के पत्ते देवी सोकराहिता का प्रतीक, अरुम का पौधा मां चामुंडा तथा धन की बाली देवी लक्ष्‍मी की प्रतीक मानी जाती है। वहीं नाबापत्रिका में उपयोग बेल पत्र को प्रभु शिव का प्रतीक माना जाता है।

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