आत्मसमर्पण की जगह मौत चुन रहे हैं कश्मीरी युवा

दिल्ली: युवा कश्मीर में आतंक की राह छोड़ने की बजट मौत को गले लगाना ज्यादा पसंद कर रहे है. हिज्बुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद के पति कश्मीरी युवाओ की वफ़ादारी का ट्रैंड बढ़ता नज़र आए रहा है जो की चिंता का विषय है साथ ही ये सेना के सिरदर्द में इजाफे का इशारा भी है. आँकड़े कहते है कि स्थानीय लोग फिदायीन हमले कर रहे हैं और आत्मसमर्पण की जगह मौत चुन रहे हैं. एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बताया, 'हिज्बुल मुजाहिदीन द्वारा भर्ती किए गए स्थानीय आतंकियों ने 31 दिसंबर, 2017 को पुलवामा में सीआरपीएफ कैंप पर फिदायीन हमला किया था. तब तक आत्मघाती हमला जैश या एलईटी द्वारा जम्मू-कश्मीर में बेहतरीन तरीके से प्रशिक्षित और प्रतिबद्ध विदेशी आतंकियों से कराया जाता था.

अधिकारी ने कहा, आतंकी अपने परिवार की अपील भी नहीं सुनते कठुआ रेप केस ने भी शायद इस गुस्से में इजाफा किया है.' खुफिया एजेंसी से जुड़े सूत्र ने बताया, 'जिस तेजी से सुरक्षा बल आतंकियों का खात्मा कर रहे हैं उससे ज्यादा तेजी से भर्तियां चल रही हैं. पिछले साल सक्रिय आतंकियों की संख्या 150-200 तक थी, अब हम 300 की बात कर रहे हैं. सूत्रों ने कहा कि पिछले साल 203 और इस साल 60 आतंकियों के मारे जाने के बाद भी स्थानीय स्तर पर भर्तियां चल रही हैं. ' 

नई-उम्र के कश्मीरी आतंकियों का प्रोफाइल भी बदल गया है. हिज्बुल मुजाहिदीन के नए भर्ती आतंकी पढ़े लिखे हैं और अच्छे परिवार से आते हैं, जिनमें से कुछ पुलिस/सेना या शिक्षक/प्रफेसर हैं. अधिकारी ने बताया, 'यह दिखाता है कि बेरोजगारी उनके आतंकवाद जॉइन करने की वजह नहीं है. कश्मीरी युवा हथियार उठाने के लिए अपनी नौकरी को भी दांव पर लगाने को तैयार हैं.' 

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