कबीर जयंती पर जरूर पढ़िए उनके यह खूबसूरत और मोटिवेट करने वाले दोहे

आप सभी को बता दें कि आज कबीर जयंती है. ऐसे में संत कबीर सिर्फ एक संत ही नहीं विचारक और समाज सुधारक भी थे और ये बात उनके दोहों में साफ झलकती है. वहीं उन्होंने अपने दोहों के जरिए जीवन की कई सीख दी हैं और उनकी बातें जीवन में सकारात्मकता लाती हैं. अब आज के दिन हम बताने जा रहे हैं कबीर के 5 ऐसे दोहे जो आपके जीवन में कुछ अच्छा करने का भाव जगाएंगे.

1. अपने को परखो दूसरों को नहीं

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.

अर्थ - कहते हैं मानव की सबसे बड़ी गलतफहमी है कि हर किसी को लगता है कि वो गलत नहीं है. यह दोहा हमारा व्यवहार हमें बता रहा है. ये दोहा कहता है कि जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. पर जब मैंने अपने मन में झांककर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है. यानी हमें लोगों को परखने के बजाए खुद का आंकलन करना चाहिए.  प्रेम ही सच्चा ज्ञान

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.

अर्थ - कबीर कहते हैं कि बड़ी -बड़ी पुस्तकें पढ़कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर उनमें से कोई भी विद्वान न हो सके. यदि कोई इंसान प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर अच्छी तरह पढ़ ले, तो वही सच्चा ज्ञानी होगा. अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान लें, यही सबसे बड़ा ज्ञान है.

3. बात के अर्थ को ग्रहण करें

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय.

अर्थ - इस दोहे में कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति को ऐसा होना चाहिए जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक तत्व को बचा लेता है और निरर्थक को भूसे के रूप में उड़ा देता है. यानी ज्ञानी वही है जो बात के महत्व को समझे उसके आगे पीछे के विशेषणों से प्रभावित ना हो और इधर-उधर की बातों में उलझने के बजाए सिर्फ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दें.

कोई भी इंसान छोटा नहीं होता

तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय,

कबहुं उड़ी आंखि न पड़े, तो पीर घनेरी होय.

अर्थ - इस दोहे के अनुसार एक छोटे से तिनके को भी कभी बेकार ना कहो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दबा होता है, क्योंकि यदि कभी वह उड़कर आंख में आ गिरे तो गहरी पीड़ा देता है. यानी कबीर ने साफ बताया है कि छोटे बडे़ के फेर में नहीं पड़ना चाहिए. मनुष्य को सभी इंसानों को उनके जाति और कर्म से ऊपर उठकर सम्मान की दृष्टि से देखना ही सार्थक है.

5. संतोषी सदा सुखी

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह,

जिसको कुछ नहीं चाहिए वो शहनशाह.

अर्थ -  कबीर जी कहते हैं इस जीवन में जिस किसी भी इंसान के मन में लोभ नहीं, मोह माया नहीं, जिसको कुछ भी खोने का डर नहीं, जिसका मन जीवन के भोग विलास से बेपरवाह हो वही सही मायने में राजा है. मतलब लालच करने वाला कभी ना सुखी होता है ना संतुष्ट और न ही कामयाब. धरती पर सभी कष्टों की जड़ लोभ है, इसके मिटते ही चिंता भी समाप्त हो जाती है और जीवन में अपने आप शांति आने लगती है.

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