'मर्जी से शादी करें और मर्जी से धर्म चुनें..', हाई कोर्ट के इस आदेश के मायने क्या ?

इंदौर: मध्य प्रदेश में अब किसी दूसरे धर्म के प्रेमी-प्रेमिका के साथ शादी करने के लिए होने वाले धर्म परिवर्तन करने की सूचना अधिकारियों को नहीं देनी पड़ेगी। राज्य की जबलपुर उच्च न्यायालय ने किसी और धर्म में शादी करने से पहले डीएम को जानकारी देने की बाध्यता खत्म करते हुए इस कानून को संवैधानिक रूप से गलत माना है।

हाई कोर्ट के अनुसार, बालिग युवा अपनी मर्जी से न केवल शादी करने, बल्कि धर्म भी चुनने के लिए आज़ाद हैं। यह फैसला देने वाले जजों ने राज्य सरकार के इस कानून को युवाओं को परेशान करने वाला नियम करार दिया है। उच्च न्यायालय से यह आदेश सोमवार (14 नवम्बर) को जारी किया गया है। जबलपुर उच्च न्यायालय से यह आदेश जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पीसी गुप्ता की बेंच ने दिया है। दोनों जजों ने अंतर्धामिक शादी में डीएम को पहले सूचना देने के नियम को बालिगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन माना है। HC ने अगले आदेश तक मामले में सरकार को कोई सख्त कार्रवाई न करने के आदेश दिए हैं। फिलहाल, अदालत ने सभी 7 याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दे दी है।

खबरों के अनुसार, जबलपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए 3 हफ्ते का वक़्त दिया है। कोर्ट में यह बहस मध्य प्रदेश शासन द्वारा लागू फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट- 2021 की धारा 10 पर हुई। इस कानून का उल्लंघन करने वालों पर 1 लाख रुपए का जुर्माना और 10 साल की सजा का प्रावधान है। मध्य प्रदेश शासन द्वारा लागू फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट- 2021 के विरुद्ध कुल 7 याचिकाएँ दाखिल की गई थीं। ये 7 याचिकाएँ अमृतांश नेमा, सुरेश कार्लटन, एलएस हार्डेनिया, आज़म खान, रिचर्ज जेम्स, आराधना भार्गव और सैमुअल डेनियल ने दाखिल की हैं। इन याचिकाकर्ताओं के वकील मनोज शर्मा, काजी फर्ख़रूद्दीन, संध्या रजक और हिमांशु मिश्रा हैं। अगली सुनवाई पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं को भी पूरी तैयारी के साथ आने को कहा है।

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