'चर्च जाने और क्रॉस पहनने से किसी का अनुसूचित जाति वाला प्रमाण पत्र ख़त्म नहीं होता'- मद्रास HC

चेन्नई: मद्रास हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि किसी दलित का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र, चर्च जाने और ईसाईयों का प्रतीक चिन्ह क्रॉस लटकाने से रद्द नहीं किया जा सकता। संविधान का हवाला देते हुए ऐसा आदेश देने वाले प्रशासनिक अफसरों को हाई कोर्ट ने “छोटी सोच” वाला बताया है। यह याचिका पी मुनीस्वरी ने दायर की थी जो पेशे से डॉक्टर हैं। दरअसल, साल 2013 में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के डीएम ने महिला डॉक्टर के SC प्रमाणपत्र को निरस्त करते हुए बताया था कि महिला ने ईसाई धर्म अपना लिया था,  जिस आधार पर वह हिन्दू समुदाय के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र योग्य नहीं है। 

प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने फैसले का आधार महिला डॉक्टर की क्लिनिक में किए गए दौरे और उसके बाद हुई जाँच के निष्कर्ष को बनाया था, जिसमें उनके मुताबिक क्लिनिक की दीवार पर एक ‘क्रॉस’ लटका हुआ पाया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के इस फैसले को वर्ष 2016 में पी मुनीस्वरी ने कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए चुनौती दी थी, जिस पर फैसला सुनाते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजीव बनर्जी और जस्टिस एम दुरईस्वामी की प्रथम पीठ के मुताबिक, ईसाई युवक से शादी करने और अपने बच्चों को अपने पति के धर्म में मान्यता देने वाली महिला का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र प्रशासनिक अधिकारियों के दिए कमजोर तथ्य और तर्क के आधार पर रद्द नहीं हो सकता।

प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामे पर सवाल उठाते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ये साबित नहीं कर सके हैं कि महिला डॉक्टर ने हिन्दू धर्म में अपनी आस्था को समाप्त कर दिया है या उसने ईसाई धर्म अपना लिया है। अदालत के मुताबिक, अगर कोई शख्स  किसी कारणवश चर्च जाता है, तो इसका मतलब ये भी नहीं है कि उसने अपने मूल धर्म में अपनी आस्था खत्म कर दी है।

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