बॉलीवुड में रोमांस को पर्दे पर उतारने वाले यश चोपड़ा ने इस तरह की थी अपने करियर की शुरुआत

बॉलिवुड फिल्म जगत में एक विशेष पहचान बनाना बहुत कठिन होता है। किन्तु जब एक बार वह पहचान प्राप्त हो जाती है तो कामयाबी कदम चूमने लगती है। जैसे बॉलिवुड में ट्रेजडी का शिरोमणि दिलीप कुमार को माना जाता है तो भारत कुमार के नाम से लोकप्रिय मनोज कुमार ने पर्दे पर देशप्रेम की अलग गाथा लिखी तथा फिर आज के समय में पर्दे पर रोमांस को उतारने में यश चोपड़ा का दूसरा कोई सानी नहीं है। यश चोपड़ा को हिन्दी फिल्मों के “किंग ऑफ रोमांस” कहे जाते है। दीवार, कभी कभी, डर, चांदनी, सिलसिला, दिल तो पागल है, वीर जारा जैसी अनेकों शानदार तथा रोमांटिक फिल्में बनाने वाले यश चोपड़ा ने पर्दे पर रोमांस एवं प्यार को नए मायने दिए हैं।

आज ही के दिन यश चोपड़ा का  निधन हुआ था, भले ही आज यश चोपड़ा हमारे बीच नहीं हो लेकिन उनकी यादें आज भी सभी के दिलों में जिंदा है। स्वतंत्रता के पश्चात् यश चोपड़ा भारत आ गए। उनके बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा बॉलिवुड के जाने-माने फ़िल्मकार और डायरेक्टर थे। बड़े भाई की प्रेरणा पर ही उन्होंने भी फिल्मों में हाथ आजमाया तथा आज यश चोपड़ा का परिवार बॉलिवुड के प्रतिष्ठित बैनरों में से एक है। उनके बेटे आदित्य चोपड़ा एवं उदय चोपड़ा भी फिल्मों से ही जुड़े हुए हैं।

यश चोपड़ा ने अपने भाई के साथ को-डायरेक्टर के रूप में काम करना आरम्भ किया। अपने भाई बी.आर चोपड़ा के बैनर तले उन्होंने निरंतर पांच फिल्में डायरेक्टेड कीं। इन फिल्मों में ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’ और ‘नया दौर’ सम्मिलित हैं। तत्पश्चात, यश चोपड़ा ने डायरेक्टर के तौर पर काम करना आरम्भ किया। उन्होंने 1959 में पहली बार अपने भाई के बैनर तले ही बनी फिल्म ‘धूल का फूल’ का डायरेक्शन किया। तत्पश्चात, उन्होंने भाई के ही बैनर तले “धर्म पुत्र” को भी निर्देशित किया। दोनों ही फिल्में औसत सफल रहीं पर इसमें यश चोपड़ा की मेहनत सबको दिखाई दी।

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