आखिर ये हंगामा क्यों बरपा है?

आखिर ये हंगामा क्यों बरपा है?

देश में कालाधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये प्रयास शुरू किये गये है, इसमें केन्द्र की मोदी सरकार को कितनी सफलता प्राप्त होती है, यह तो थोड़े दिनों में साफ हो ही जायेगा लेकिन लोकसभा तथा राज्यसभा में विपक्षी दलों द्वारा जिस तरह से हंगामा बरपाया जा रहा है वह निश्चित ही समझ से परे प्रतीत होता है। आखिर हंगामा क्यूं बरपाया जा रहा है, इसका जवाब अंतस मन में विपक्षी दलों के पास भी नहीं होगा। चुंकि राजनीति करना है इसलिये कुछ न कुछ मुद्दे तो चाहिये ही, वरना फिर राजनीति करने का मतलब ही क्या?

हम यहां न तो मोदी सरकार का पक्ष ले रहे है और न ही विपक्षी दलों की आलोचना करने का हमारा मकसद है, जो सत्य है उसे ही लिखने की हिम्मत कर रहे है। नोटबंदी को लेकर हंगामा मचाने वाले विपक्षी दलों के नेता यह स्वयं भी जानते है कि उनके चिल्लाने से कुछ होना नहीं, क्योंकि विपक्षी नेता यह अच्छी तरह से जानते है कि मोदी अपनी जिद के पक्के है, वे मानेंगे नहीं। विपक्षियों को यह भी मालूम है कि मोदी ने उनके वार को झेलने के लिये हर तरह से कवच धारण कर रखे है। तो फिर क्या अब भी विपक्षियों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि चुप हो जाना ही उनके लिये बेहतर है। तिल का ताड़ बनाना जैसे आदत में शुमार हो गया है हमारे देश की जनता को।

प्याज का ही उदाहरण लिया जाये, जब प्याज के भाव आसमान छूने लगे थे तो इतने प्याज घर में जमा कर लिये गये कि सड़ने पर खुद ने ही अपने हाथों से नाली में बहा दिये और अब प्याज कौड़ी के कुटार हो गये है तो कोई धरमसांटे नहीं पूछ रहा है। ऐसा ही नोटबंदी के कारण होता नजर आ रहा है। हौव्वा बनाना तो हमारे देश की जनता से कोई सीखें, ऊपर से राजनीतिज्ञ ऐसी सत्या छोड़ देते है कि अपने देश में होने वाली छोटी सी घटना भी विदेशों तक पहुंच जाती है।

कालाधन खत्म करना या देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना कोई बुरी बात तो नहीं है, हमें सत्य की राह पर चलना चाहिये, ईमानदारी से काम करना चाहिये, इन सबकी बातें करना ही अच्छा लगता है, यर्थाथ के धरातल पर कथनी और करनी में अंतर बना रहता है, इसलिये यदि किसी ने हिम्मत की है तो फिर उसके मार्ग में बाधा तो मत बनो यारों! खुद भी मत करों और दूसरों की भी टांग खींचो, इस प्रवृत्ति का त्याग, मौजूदा समय की आवश्यकता है। - शीतलकुमार ’अक्षय’