इस श्राप के चलते शिव जी ने काट दिया था अपने ही पुत्र का सिर

भगवान शिव की कई कहानियाँ हैं जो आप सभी ने शायद ही पढ़ी या सुनी होंगी. क्या आप जानते हैं कि भगवान भी अपने बुरे कर्मो से भाग नहीं सकते। जी दरअसल पुराणों में भी कई किस्से ऐसे हैं जिससे पता चलता है कि अपने कर्मों के बंधन से स्वयं ईश्वर भी बच नहीं पाए। ऐसी ही एक कथा भगवान शंकर की है. इस कथा में उनके द्वारा किये गए एक कार्य के कारण उनके पुत्र गणेश जी को मरना पड़ा था. जी हाँ और आज हम आपको उसी कथा के बारे में बताने जा रहे हैं.

जब शिव जी ने काटा था श्री गणेश का सिर- एक बार माता पार्वती ने नंदी को द्वार का पहरेदार बनाकर उन्हें आज्ञा दी की वे किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दें, किन्तु जब स्वयं शिव शंकर पधारे और उन्होंने नंदी को द्वार से हटने की आज्ञा दी तो वे उन्हें मना नहीं कर पाए और शिन को अंदर जाने दिया। जिससे माता पार्वती बहुत दुखी हुईं, उन्होंने निर्णय किया की वे एक ऐसा बालक उत्पन्न करेंगी जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे। इसलिए उन्होंने उबटन और अपने शरीर के मैल से एक बालक निर्मित किया और उसमे प्राणों की प्रतिष्ठा की। उस बालक से माता ने कहा तुम मेरे पुत्र कहलाओगे और तुम केवल मेरी ही आज्ञा को सर्वोपरि मानोगे। इस प्रकार गणेश जी की उत्पत्ति हुई। माता ने अपने पुत्र को आज्ञा दी की वे किसी को स्नान के समय भीतर प्रवेश न करने दे। इस प्रकार प्रतिदिन गणेश जी द्वार पर पहरा देते थे, एक दिन शिव जी अपने ध्यान से उठकर पार्वती जी से मिलने उनके भवन की तरफ आये। किन्तु गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया, शिव जी ने बहुत समझाया किन्तु वह न माने। इस प्रकार उनमे युद्ध शुरू हो गया, गणेश जी ने शिव के गणों को खूब परेशान किया और बहुत मारा इससे शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश का शीश अपने त्रिशूल से उखाड़ डाला। माता ने जब अपने पुत्र का शीश कटा हुआ देखा तो वे अत्यंत क्रुद्ध हो गयीं, वह शिव को श्राप देने को आतुर हो गयीं। तब देवताओं के अनुनय विनय से माता शांत हुई और शिव से उनके पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना करने लगीं। शिव जी ने अपनी भूल को सुधारने के लिए गणेश जी के शीश में एक हाथी का शीश लगा दिया और उन्हें जीवित कर दिया।

क्या श्राप मिला था शिव जी को- पुराणों के अनुसार शिव जी ने अकारण ही अपने पुत्र का शीश नहीं काटा था बल्कि यह एक श्राप का दुष्परिणाम था। जी दरअसल एक समय की बात है माली सुमाली नामक दो राक्षस थे, वे दोनों ही शिव के परम भक्त थे। वे दोनों ही बहुत शक्तिशाली थे और स्वर्ग पर अधिकार करना चाहते थे, इसलिए उनको मारने के लिए सूर्यदेव स्वर्गद्वार पर खड़े हो गए। सूर्यदेव भी अत्यंत तेजस्वित थे और उनमे दोनों राक्षसों को मारने की क्षमता भी थी। इसलिए दोनों ही शिव से उन्हें बचाने की प्रार्थना करने लगे, शिव जी को अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए वहां आना पड़ा और उन्होंने सूर्यदेव पर त्रिशूल से प्रहार कर दिया। इस प्रहार से सूर्य निश्तेज होकर गिर गए और मरणासन्न हो गए। तभी महर्षि कश्यप वह पहुंचे, अपने पुत्र को ऐसी अवस्था में देख वे विलाप करने लगे और क्रोध में उन्होंने शंकर को श्राप दे दिया कि जिस प्रकार तुमने मेरे पुत्र को मारा है उसी प्रकार तुम स्वयं अपने पुत्र को मारोगे।

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