हिंसाग्रस्त मणिपुर में सुरक्षाबलों की तैनाती का विरोध क्यों कर रहे लोग ?

हिंसाग्रस्त मणिपुर में सुरक्षाबलों की तैनाती का विरोध क्यों कर रहे लोग ?
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इम्फाल: हिंसा से जूझ रहे मणिपुर के कई जिलों में रविवार को एक हैरान करने वाली घटना देखने को मिली। यहाँ बड़ी संख्या में लोगों ने सुरक्षा बालों की भारी तैनाती के विरोध में प्रदर्शन किए। यह विरोध प्रदर्शन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संघर्षग्रस्त राज्य में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के लिए बुलाई गई उच्च स्तरीय बैठक के कुछ दिनों बाद हुआ है। पिछले कुछ दिनों में घाटी के जिलों में विभिन्न स्थानों पर केंद्रीय बलों को तैनात किया गया है। राज्य में उपद्रवी तत्वों से निपटने और शांति स्थापित करने के लिए सरकार ने ज्यादा जवानों की तैनाती का फैसला लिया था, जिसके खिलाफ स्थानीय लोग ही सड़कों पर उतर आए हैं। 

इंफाल में थांगमेइबंद डीएम कॉलेज के गेट के बाहर धरना दिया गया। इसके अलावा कई महिला प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के सरकारी आवास की ओर मार्च भी किया। इंफाल के कांचीपुर में मणिपुर यूनिवर्सिटी गेट पर पुलिस ने महिलाओं को रैली निकालने से रोक दिया। बाद में उनमें से कुछ को संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने की अनुमति दी गई। मीडिया से बात करते हुए, इमेजी मीरा ओटगानिस नामक संगठन की संयोजक सुजाता देवी ने कहा कि वे मणिपुर की मौजूदा स्थिति की ओर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, क्योंकि इस समय संसद सत्र चल रहा है।

राज्य में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती पर टिप्पणी करते हुए सुजाता देवी ने कहा कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को दूरदराज और संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जाना चाहिए। इसके बजाय, उन्हें मुख्य रूप से घाटी क्षेत्रों में तैनात किया जा रहा है। एक अन्य महिला नेता एमा नगनबज ने कहा कि मणिपुर की स्थिति पर केन्द्र सरकार को ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि राज्य के लोग योजनाबद्ध सामूहिक तलाशी अभियान और अत्यधिक बल प्रयोग की संभावना की खबरों से खतरा महसूस कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि राज्य में लोग पहले से ही कष्ट झेल रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा शक्ति का अत्यधिक प्रयोग इस समय आवश्यक नहीं है।
मणिपुर में पिछले वर्ष 3 मई से जातीय हिंसा जारी है, जब बहुसंख्यक मैतेई समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में राज्य के पहाड़ी जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला गया था। जारी हिंसा में कुकी और मैतेई समुदायों के 220 से अधिक लोग और सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। मणिपुर की जनसंख्या में मैतेई लोगों की हिस्सेदारी लगभग 53 प्रतिशत है तथा वे मुख्यतः इम्फाल घाटी में रहते हैं, जबकि नागा और कुकी सहित जनजातीय लोग 40 प्रतिशत हैं तथा मुख्यतः पहाड़ी जिलों में रहते हैं।

क्या है मणिपुर में हिंसा का मूल कारण ?

बता दें कि, मणिपुर की आबादी में मैतेई लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है और वे ज्यादातर इम्फाल घाटी में रहते हैं, जो कि पूरे मणिपुर का लगभग 10 फीसद क्षेत्र है। वहीं,  जबकि आदिवासी, जिनमें नागा और कुकी शामिल हैं, की आबादी 40 प्रतिशत हैं और मुख्य रूप से पहाड़ी जिलों में रहते हैं। मणिपुर का 90 फीसद हिस्सा पहाड़ी है, जिसमे केवल कुकी-नागा जैसे आदिवासियों (ST) को ही रहने और संपत्ति खरीदने की अनुमति है, ऐसे में मैतेई समुदाय के लोग महज 10 फीसद इलाके में रहने को मजबूर हैं। उन्होंने ST का दर्जा माँगा था, जिसे हाई कोर्ट ने मंजूरी भी दे दी थी, लेकिन इससे कुकी समुदाय भड़क उठा और विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। यही हिंसा की जड़ रही।

 

बताया जाता है कि, कुकी समुदाय के अधिकतर लोग धर्मान्तरित होकर ईसाई बन चुके हैं और वे घाटी पर अफीम की खेती करते हैं, इसलिए वे घाटी में अपना एकाधिकार रखना चाहते हैं और किसी को आने नहीं देना चाहते। विदेशी फंडिंग और मिशनरियों के इशारे पर चलने वाले अधिकतर NGO इन्ही कुकी-नागा लोगों को भड़का रहे हैं। इन कुकी समुदाय को खालिस्तानियों का भी साथ मिल रहा है, कुकी समुदाय का एक नेता कनाडा जाकर खालिस्तानी आतंकियों से मिल भी चुका है, जहाँ से उन्हें फंडिंग और हथियार मिले थे। वहीं, म्यांमार और चीन भी कुकी लोगों को मैतेई से लड़ने के लिए हथियार दे रहे हैं।

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