स्टेज पर बिजली नहीं होने के कारण 'रफ़ी साहब' को मिला था गाने का पहला मौक़ा

बॉलीवुड में गानों के राजा कहे जाने वाले रफ़ी साहब के बिना हिंदी सिने संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनके शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों की भी एक अलग ही दुनिया है। वर्ष 1924 को जन्म लेने वाले रफी साहब 31 जुलाई 1980 को इस दुनिया से हमेशा अपना मुँह मोड़ लिया। हम बता दें की उनका जन्म पंजाब के एक गांव कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार रफ़ी साहब को बचपन से ही संगीत के शौकीन थे, रफी ने अपनी संगीत शिक्षा उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से ली थी। वह हमेशा ही अपने बड़े भाई की दुकान पर गाकर लोगों की प्रशंसा जीतने वाले रफी साहब ने अपना पहली प्रदर्शन लाहौर आकाशवाणी पर पूरा किया था।

उस वक़्त के प्रख्यात गायक कुंदनलाल सहगल ने स्टेज पर बिजली नहीं होने के कारण से गाने से इनकार कर चुके थे, इस पर 13-वर्षीय मोहम्मद रफी को गाने का मौका मिल गया था। उनके गाने को सुनकर हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार श्यामसुन्दर ने उन्हें अपने पास मुंबई आने का ऑफर भी दिया। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो रफ़ी साहब मुंबई से ही उनके फ़िल्मी संगीत के करियर की शुरुआत हुई। उनका पहला गीत एक पंजाबी मूवी गुल बलोच में था जबकि उन्होंने अपना प्रथम  हिन्दी गीत संगीतकार नौशाद के लिए 'पहले आप' नाम की मूवी में गाया।

हम बता दें कि बैजू-बावरा में प्लेबैक सिंगिंग करने के उपरांत रफी साहब ने फिर कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नौशाद, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैय्यर, मदन मोहन जैसे संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बन चुके रफी दिलीप कुमार, राजेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र, शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की  वौइस् बन गए। इतना ही नहीं वर्ष 1960 की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में रफी साहब का गाया हुआ गाना 'मोहब्बत जिंदाबाद' बहुत ही खास है। इस गाने में उनके साथ 100 दूसरे सिंगर्स ने भी कार्य कर चुके है। रफी साहब ने अपने अपने पूरे करियर  में 23 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट हो चुके थे। उन्होंने ये अवॉर्ड 6 बार जीता था।

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