क्या है सत्य, अहिंसा और प्रेम की परिभाषा?

क्या है सत्य, अहिंसा और प्रेम की परिभाषा?

सत्य, अहिंसा और प्रेम मानव जीवन में अतिआवश्यक तत्व है. यह मानव के सफलतम जीवन की सच्ची सीढ़ी है. इस संसार सागर में जिस व्यक्ति ने इन तीनों को अपने जीवन में उतार लिया तो मानों उसका जीवन सफल हुआ और यही उसकी मानवता है.मानव जीवन में इन तीनो का भाव होना बहुत ही जरूरी होता है.

अहिंसा- 

अहिंसा का अर्थ हम प्राय: हिंसा के विलोम शब्द के रूप में लेते हैं, जिसका आशय जीवहत्या न करना और मांसाहार से दूर रहना आदि है। मांसाहार जीवहत्या के बगैर संभव नहीं है। इसलिए दोनों ही हिंसा की श्रेणी में आते हैं। मौजूदा संदर्भ में सवाल उठता है.कि क्या अहिंसा को एक सीमित दायरे में बांधा जा सकता है? जी नहीं, अहिंसा का क्षेत्र व्यापक है. और अहिंसा का संक्षेप में अर्थ है - समस्त हिंसक वृत्तियों का त्याग। 

दूसरों को दुःख देना, सताना, हिंसा के दायरे में आता है. अहिंसक वे व्यक्ति कहलाते है. न दूसरों को और न ही स्वयं को सताता है, वह स्वस्थ व प्रसन्न् भाव से संतोषपूर्वक जीता है। वह अपने जीवन में परोपकार की भावना रखता है निर्बल ,बलसाली , गरीब , अमीर अभी के साथ एक सा व्यवहार करता है.सद भाव से आगे बढ़ता है. वही अहिंसा है इसके अतिरिक्त सबल वर्ग द्वारा निर्बल का किया गया किसी भी प्रकार का शोषण एक खतरनाक हिंसा है।

प्रेम - अधिकांश तौर पर देखा जाता है. की लोग केवल अपनों से प्रेम करते है उनके सुख दुःख पर शामिल होते है. और यदि अपनों से थोड़ा दुखी हुए तो प्रेम करना छोड़ देते है. पर ऐसा नहीं है. प्रेम तो अद्भुत है. प्रेम की परिभाषा यह है की उसकी कोई सीमा नहीं होती है. न ही स्वार्थ होता यह हमेशा एक सा भाव लेकर अटलता को हासिल करता है .यह अटूट होता है. इसकी कोई सीमा नहीं होती सुख दुःख में एक जैसा बरकरार रहता है.

सत्य - सत्य वह है जो हर समय हर हल में अपने कर्तव्य पथ पर चलते हुए झूठ का त्याग कर कठिन से कठिन मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाये सत्यता को हासिल करे अपने वयानों को न बदले कही गई बातों और घटना को सही रूप में प्रस्तुतीकरण दे . व्यक्ति के जीवन कितनी भी परेशानियां क्यों न आए लेकिन सत्य की हमेशा जीत होती है