'मुस्लिमों के पिछड़ने में हमारा क्या दोष...', मुस्लिम सर्वे के खिलाफ हिंदू महासंघ ने उठाया ये बड़ा कदम

मुंबई: महाराष्ट्र सरकार द्वारा करवाए जा रहे मुस्लिम सर्वे के विरुद्ध हिंदू महासंघ अदालत जाने की तैयारी कर रहा है। हिंदू महासंघ ने प्रश्न किया है कि यदि घोड़ा पानी नहीं पी रहा है तो इसमें पानी का क्या दोष है? मतलब यदि मुस्लिम पिछड़ रहे हैं तो इसमें बहुसंख्यकों का क्या दोष है? पुणे मौजूद हिंदू महासंघ के अध्यक्ष आनंद दवे ने बताया कि आगे बढ़ने के लिए सबको समान मौका है, फिर भी किसी को प्रगति के मार्ग में जाने की जगह धर्म अधिक अहम नजर आता है तो नतीजों के लिए वो स्वयं जिम्मेदार है।

अपने एक इंटरव्यू में हिंदू महासंघ की तरफ से आनंद दवे ने कहा कि एतराज इस बात पर है कि इसके लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा लोगों के करोड़ों रुपए खर्च करने की क्या दरकार है?दो दिन पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुस्लिम समाज के लिए एक बड़ा निर्णय लिया था। इस निर्णय के तहत मुस्लिम समाज की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक परिस्थियों का सर्वे करवाया जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने सर्वे कराने के लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज संस्था (TISS) को 34 करोड़ का ठेका दे दिया। इसके तहत 56 ऐसे शहरों में सर्वे किया जाएगा जहां मुसलमानों की संख्या अधिक है। इसमें पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि प्रदेश के मुस्लिम यदि पिछड़े हैं तो क्यों हैं तथा उन्हें आगे लाने के लिए और समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित करने के लिए क्या प्रयास किया जाएं।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा वर्ष 2013 में नियुक्त महमूद-उर-रहमान की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर नई रिपोर्ट सबमिट किए जाने के लिए अब एक नया आदेश जारी किया गया है। इस पर हिंदू महासंघ के अध्यक्ष आनंद दवे ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ़ अदालत जाने की बात कही है। साथ ही आनंद दवे ने सवाल उठाया कि क्या यही एक समाज पिछड़ा हुआ है? तथा क्या उसके जिम्मेदार बहुसंख्यक हैं? मुस्लिम समाज के सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास का शोध करने के लिए सरकार ने एक प्राइवेट कंपनी को लगभग 34 करोड़ रूपए का ठेका दिया। मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने के लिए भी सरकार ने सुझाव मांगे गए हैं। इसका मतलब तो यही हुआ कि 75 वर्ष पश्चात् भी यह समाज मुख्य धारा में नही आ पाया। साथ ही आनंद दवे कहते हैं कि विकास उन तक नहीं पहुंचा तथा वे विकास तक नहीं पहुंचे। वास्तव में उनके नेता ही नहीं, बल्कि वे भी सोचते हैं कि प्रगति से अधिक मजहब महत्वपूर्ण है। यदि उन्हें स्वयं को बदलने की जगह बहुसंख्यक लोगों के खिलाफ लड़ना पसंद हैं, तो कोई क्या कर सकता है? यदि घोड़े को पानी नहीं पीना है, तो पानी का क्या दोष? हिंदू समाज यह प्रश्न भी उठा रहा है कि सरकार किस अधिकार के तहत यह निर्णय ले रही है। और यदि सरकार ने सर्वे करवाने की पहल की ही है तो सभी समाज का सर्वे क्यों नहीं किया जा रहा है। यदि ऐसा होगा तो पता चलेगा कि किसे कितना हक मिलना चाहिए तथा कहां-कहां, कैसे-कैसे मिलना चाहिए। लेकिन यह सोचना कि सिर्फ एक समुदाय ही गरीब है तथा उसके लिए सब कुछ किया जा रहा है, तो यह हिंदू महासंघ बर्दाश्त नहीं करेगा। आनंद दवे ने कहा कि हमारे अधिवक्ता इसका अध्ययन कर रहे हैं तथा हम जल्द ही हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।

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