हम तो बदल गए....अब पुरुषों की बारी.......

Dec 03 2014 03:25 PM
हम तो बदल गए....अब पुरुषों की बारी.......
महिलाएं तो अक्सर ही पुरुषों के बीच चर्चा का विषय रहती हैं और उससे भी अधिक महिलाओं के कपड़े पुरुषों को ध्यान खींचते हैं! हाल ही में हिन्दू महासभा के नेता नवीन त्यागी ने फिल्मों में छोटे कपड़े पहनकर आइटम सॉन्ग करने वाली अभिनेत्रियों को वेश्या करार देने की मांग की है साथ ही स्कूल,कॉलेज में लड़कियों के जींस और मोबाइल पर पाबंदी की मांग की है! यह पहला मौका नहीं है जब महिलाओं के कपड़ों को लेकर, महिलाओं की स्वतन्त्रता को लेकर इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है और न ही यह कोई नई बात है क्योंकि आखिर आज भी यह समाज पुरुष प्रधान समाज ही हैं! भले ही लाख दुहाई दें कि हम आधुनिक युवा है, 21वीं सदी के स्वतंत्र नागरिक हैं लेकिन समाज के कतिपय ठेकेदार इस सोच पर ताला जड़ा रहना देना चाहते है!
 
लेकिन अब समय आ गया है जब पुरुषों की इस घटिया मानसिकता पर लगाम लगाई जाए! आखिर एक सिक्के के दो पहलू मर्द और औरत इस धरती पर दो अलग ध्रुवों की तरह कैसे रह सकते हैं? लेकिन ये भी सही है कि यदि पुरुष नहीं बदले तो महिलाओं को बदलना होगा! पुरुषों के दिमाग में ये बात बिठानी होगी कि “आदमी की फितरत ही......ऐसी होती है....” गलत है! आपकी फितरत......ऐसी है....तो उसे बदलो! अब और अधिक अपने मूर्खतापूर्ण कुतर्कों से कि आदमी बाय डिफॉल्ट, बाय नेचर ऐसे ही हैं, हमें और अधिक मूर्ख नहीं बना सकते! अब महिलाएं बदल रही हैं! जमाना बदल रहा है! आपको भी बदलना होगा!
 
महिलाओं को भी अपनी आज़ादी से जीने का हक़ है! लेकिन किसी और पुरुष को हक़ नहीं कि उनकी आज़ादी, उनके पहनावे पर रोक लगाएँ! महिलाओं पर बन्दिशें लगाने के पहले अपनी घटिया मानसिकता को ताला लगाएँ और खुले दिमाग से, विस्तृत नजरिए से महिला के अस्तित्व को स्वीकार करें! महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली नहीं कि उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जाये! महिलाएं भोग की वस्तु नहीं है! उनका भी वजूद है, उनका भी अस्तित्व है, उनकी भी खुशियाँ है जिसे जीने का उन्हें पूरा हक़ है न कि पुरुषों के हिसाब से खुद की सीमाएं तय करने का!
 
आखिर कब तक महिलाएं टैग के सहारे जिएंगी ? कब तक पुरुष प्रधान समाज उन्हें किसी न किसी परिभाषा में बांधे रहेगा ? कब तक महिलाओं को दूसरों की पसंद पर अपना जीवन गुज़ारना होगा? कब तक ये समाज महिलाओं को किसी न किसी कैटेगरी में बिठाती रहेगी?
 
महिलाएं बेटी,बहन,पत्नी, माँ, भाभी, ननद सभी किरदार निभाती हैं, स्वीकारा! लेकिन ये भी तो स्वीकारना होगा कि इन सब से ऊपर वह एक महिला है! उसका खुद का अस्तित्व है! उसे खुद का जीवन खुद की तरह से जीने का हक़ है! उसे खुद का करियर, खुद का प्रोफेशन चुनने का हक़ है! एक तरफ देश मंगल पर पहुँच गया है और आज भी महिलाओं को अपने कपड़े चुनने तक का हक़ नहीं मिला है! ये समाज की पराकाष्ठा है! आज भी महिलाओं को श्रेणियों में बांटा जाता है! आज भी उन्हें टैग देकर परिभाषित किया जाता है!
 
यदि वे सजती सँवरती हैं तो, वे बनावटी है! यदि वे मेकअप नहीं करती तो बहन जी है! यदि वे अच्छे कपड़े पहनती हैं, तैयार होती है, तो दिखावटी हैं! यदि वे खुद पर ध्यान नहीं देती तो देहाती है! यदि महिलाएं अपने मन की इच्छा, अभिलाषा, अरमान जाहिर करती है तो उन्हें अभद्र भाषा से नवाजा जाता है! यदि वे कुंठित रहती हैं, अपने अरमानों की अभिव्यक्ति नहीं करती हैं तो कहा जाता है एटीट्यूड प्रॉबलम! यदि महिलाएं अपना दुख आंसुओं में निकालती हैं
 
तो ड्रामा क्वीन कहा जाता है! यदि दुख व्यक्त नहीं करती तो पत्थर की मूर्ति कहा जाता है! यदि महिलाएं विपरीत लिंग, पुरुषों से दोस्ती करती हैं तो उन्हें चीप की संज्ञा दी जाती है और यदि नहीं करती हैं तो संकीर्ण मानसिकता का, करार दे दिया जाता है! यदि वे खुद के हक़ के लिए आवाज उठाती हैं तो तेज, झगड़ालू कहलाती हैं! और यदि वे अन्याय सहन करती हैं तो मूर्ख कहलाती हैं! आखिर कब तक...और कब तक...... ये समाज महिलाओं को अलग अलग खांचों में बंद कर रखेगा ? अब समय आ गया है कि महिलाओं के अस्तित्व को स्वीकार करो! उन्हें परिभाषित करना बंद करो! वरना महिलाओं ने तो आगे बढ़ना सीख लिया है! अकेले ज़िंदगी भी व्यतीत कर ही लेंगी, वो भी खुशी-खुशी....वे आत्म निर्भर हो रही हैं.......सजग हो रही हैं! खुद के वजूद को पहचान रही हैं! खुद से प्यार करने लगी हैं!