26 अप्रैल को है वरुथिनी एकादशी, जरूर पढ़े यह कथा

पंचांग के अनुसार वैशाख के महीने (vaishakh month 2022) में कृष्ण पक्ष के दौरान पड़ने वाली एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi 2022) के नाम से जाना जाता है। वहीं हिन्दू धर्म में एकादशी का बहुत महत्व होता है और आप सभी जानते ही होंगे साल में 24 एकादशी तिथि होती हैं। जी हाँ और हर एकादशी का नाम महत्व अलग होता है। जी दरअसल इस दिन भगवान विष्णु (lord vishnu) की पूजा करने का विधान होता है। वहीं चैत्र के महीने के दिन पड़ने के चलते इसे वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि वरुथिनी एकादशी पर व्रत रखने पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। आप सभी को बता दें कि इस साल वरुथिनी एकादशी 26 अप्रैल के दिन (varuthini ekadashi 2022 date) यानी मंगलवार को पड़ रही है। तो, हम आपको बताते हैं वरुथिनी एकादशी की कथा।

वरुथिनी एकादशी की कथा- इसकी कथा के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी न जाने कहां से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला। राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था।

इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले- 'हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।' भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। जो भी व्यक्ति भय से पीड़ित है उसे वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग गया था। इस व्रत को करने से समस्त पापों का नाश होकर मोक्ष मिलता है।

जब शनिदेव को हनुमान जी ने लपेट लिया था अपनी पूंछ में, जानिए पौराणिक कथा

अकेले सोता था लंकपति रावण, बहुत खास है वजह

संकष्टी चतुर्थी के दिन जरूर पढ़े यह कथा

 

- Sponsored Advert -

Most Popular

- Sponsored Advert -