शहीद उधम के कदमों ने हिला दीं थी अंग्रेजी सत्ता की जड़ें

नई दिल्ली : जलियांवाला बाग नरसंहार को लेकर आखिर किसका बदन सिहरता नहीं है। वह हत्याकांड जिसमें अंग्रेजों की क्रूरता साफतौर पर बयां हो गई थी। अंग्रेजों ने जलियावाला बाग में निहत्थी भारतीय जनता पर गोलियों से वार किए। महिलाऐं बच्चे और बुजुर्ग अहिंसक प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसे में अंग्रेजों ने जनता पर गोलियों से वार कर दिया। उधम सिंह इस हमले से विचलित हो उठे।

उन्होंने भारतीय जनता पर गोलियां बरसाने वाले अंग्रेज अधिकारी जनरल ओ. डायर को मारने की ठान ली और उन्हें मारकर ही दम लिया। जनरल डायर को मारने वाले बहादुर क्रांतिकारी कोई और नहीं बल्कि उधम सिंह ही थे। गोलियों से भूनने के बाद वे भागे नहीं उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। माइकल ओ डायर के अलावा किसी और को उन्होंने अपने हमले का शिकार नहीं बनाया।

वहां पर महिलाऐं और बच्चे भी थे। अंग्रेजों ने उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई। जब उनसे पूछा कि उन्होंने किसी और को गोली क्यों नहीं मारी, तो वीर उधम सिंह का जवाब था कि सच्चा हिंदुस्तानी कभी महिलाओं और बच्चों पर हथियार नहीं उठाता। उन्हें भगत सिंह के बाद शहीद - ए - आजम के नाम से जाना गया। 

उधम का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले में हुआ। सुनाम गांव में जन्मे उधम की माता वर्ष 1901 में और पिता 1907 में इहलोक चले गए। इसके बाद वे अनाथ हो गए। बड़े भाई मुक्ता सिह के साथ उन्हें अनाथालय में अपना समय गुजारना पड़ा। उनका नाम शेर सिंह था मगर अनाथालय में उन्हें दूसरा नाम उधम सिंह मिला। उनके भाई भी 1919 को स्वर्ग सिधार गए।

जिसके बाद उन्होंने क्रांतिकारियों का साथ दिया। उन्होंने भारत की सांप्रदायिक एकता को ध्यान में रखते हुए स्वयं का नाम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था। उन्होंने 13 मार्च 1940 को राॅयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाॅल में बैठक ली। जहां माइकल ओ डायर को उन्होंने गोलियों का निशाना बनाया। उधम सिंह की तत्काल मौत हो गई। उन्हें इस कार्य के लिए फांसी की सजा दी गई लेकिन वे विचलित नहीं हुए।

- Sponsored Advert -

Most Popular

- Sponsored Advert -