बचपन की यादों से जुड़े कुछ सुनहरे ख़ेल...

पिठ्ठू गरम...

इस खेल को खेलने के लिए सात चपटे पत्थर और एक गेंद की जरुरत होती है. इसमें पत्थरों को एक के ऊपर एक जमाया जाता है. इस खेल में दो टीमें भाग लेती हैं. एक टीम का खिलाड़ी पहले गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसकी टीम के सदस्यों को पिट्ठू गरम बोलते हुए उसे फिर से जमाना पड़ता है. इस बीच दूसरी टीम के ख़िलाड़ी गेंद को पीछे से मारते हैं. यदि वह गेंद पिट्ठू गरम बोलने से पहले लग गयी तो टीम बाहर. कितने भी लोग इसे खेल सकते हैं पर दोनों टीमों में बराबर खिलाड़ी होने चाहिए. इस खेल का नाम स्थानीय जगहों के हिसाब से अलग-अलग होता है. 

रस्सी कूदना...

वैसे तो सभी को पता है कि रस्सी वजन घटाने के लिए एक अच्छा व्यायाम है पर गांव में इसे दूसरे तरीके से खेल की तरह खेला जाता है. वहां मज़े लेकर इसे खेला जाता है. दो लड़कियां एक रस्सी को दोनों सिरों से पकड़ लेती हैं और उसे घुमाना शुरू करती हैं. तीसरी लड़की बीच में कूदती है. सबकी बारी आती है, जो सबसे ज्यादा बिना रुके कूदती है, वह जीतती है.

लंगड़ी टांग...

यह खेल मुख्यत: लड़कियां खेलती हैं. हालांकि लड़के भी इसका मजा लेने से नहीं चूकते. इसको खेलने के लिए घर के आंगन, मैदान या कहीं और कई चाक या फिर ईंट के टुकड़े से खाने बनाये जाते हैं. फिर पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर सरकाना पड़ता है, वो भी बिना लाइन को छुए हुए. अंत में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है. इस खेल को खेलने के लिए कम से कम दो खिलाड़ियों की जरुरत होती है. इस खेल को खेलने के कई अन्य तरीके भी हैं, जो क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग देखने को मिलते हैं.

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