खोजकर तो देख अंधकार में भी होते है दर्शन

आप देखते ही है की अंधेरा और उजाला, रात और दिन यूं तो जीवन का हिस्सा है। बात चाहे दैनिक जीवन की हो या फिर प्रतीकात्मकता की। हर इंसान का जीवन दिन-रात की तरह ही होता है। अंधेरे और उजाले में बंटा हुआ। जैसे दिन हुआ तो रात  रात है तो दिन होगा.

इसी तरह जीवन में सुख-दुख भी आते जाते है. इस जगत में अध्यात्म और धर्म के क्षेत्र में भी अंधेरा और उजाला प्रतीकों के तौर पर मौजूद हैं। उजाला हर तरह की सकारात्मकता का प्रतीक है. हर तरह की नकारात्मकता को अंधेरे के प्रतीक से परिभाषित किया गया है। ज्ञान उजाला है, अज्ञान अंधेरा। 

जिनसे अध्यात्म को जाना उसने उजाला ही देखा और जो इससे दूर है वह इस संसार में सूर्य के होते हुए भी अन्धकार में जी रहा है . इस संसार सागर में प्रेम, सद्भाव , ममता, वात्सल्य, नैतिक, सद् इन सबको रोशनी से परिभाषित किया गया है, और ईर्ष्या, द्वेष, अनैतिकता, इस तरह की सारी भावनाओं को अन्धकार से । लेकिन ये बस प्रतीकात्मकता तक ही सीमित है।

बिना अंधकार के हम सृजन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। सोचें कि धरती के भीतर बीज के अंकुरित होने से लेकर कोख में जीव के विकसित होने तक का साक्षी सिर्फ और सिर्फ अंधकार ही तो है। ये अंधकार ही है जो हमें खुद के साथ रहने, भीतर झांकने और महसूस करने का अवसर देता है। 

हम इस संसार के सभी भौतिक अवस्थाओं में क्रियाओं में लगे रहते है ओर उसी को प्रकाश भरा जीवन मान बैठते है जबकि ऐसा नहीं है अध्यात्म को धारण करना उसकी रह में चलना धर्म कर्म को मानना ही प्रकाश की रह है .

ध्यान की अवस्था भी हमें आंखें बंद करने के बाद ही प्राप्त होती है। बिना अंधेरा के हम अपने करीब नहीं आ पाते हैं, हम खुद को जान नहीं पाते हैं। ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे अच्छा माध्यम ध्यान है बिना एकाग्रता के हम ध्यान नहीं कर सकते. हम ध्यान के माध्यम से ही अपनी अंतरात्मा में ईश्वर के दर्शन कर पाते है.

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