दूसरों की निंदा करने का यह है परिणाम

Oct 09 2015 05:44 AM
दूसरों की निंदा करने का यह है परिणाम

सामान्य मनुष्य की इंद्रियां उनके बस मे नहीं रह पाती है। क्योकि वे उन्हें बस मे करने का प्रयास ही नहीं करते है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर अपनी बुद्धी का सद उपयोग करे तो वह अपने आप को जल्द ही बदल सकता है। और उसकी सोच अच्छी हो सकती है। व्यक्ति अपने मन से ही अच्छा व बुरा बनता है उसके भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत से आते जाते है । कई बार यह होता है की हम अधिक धनाभाव के धन को देखकर बहुत परेशान होते है पर उससे उसका कुछ नहीं बिगड़ता हम खुद व खुद अपने आप मे जलते रहते है। और उसके प्रति गलत भाव जाग्रत करते है ।

उसी तरह धनवान व्यक्ति भी गरीबों को देखकर भयभीत रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की गलत दृष्टि न पड़े और वे उसके धन को चुरा न लें । वह अपने धन वैभव मे इतना लीन रहता है की उसे अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रहता है।विशेषज्ञ लोग कहते हैं कि यदि हमारे देश में धनवानों की संख्या बढ़ती है तो निश्चित रूप से देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। मनुष्य का ईर्षा व जलन तथा निंदा का भाव उसे ले डूबता है वह अपने आप मे परेशान रहता है। और अपनी इस मानव रूपी देह को नष्ट कर देता है मनुष्य को निंदा का भाव छोड़ देना चाहिये। किसी से जलन द्वेष आदि की भावना लाना बहुत बुरी बात होती है।

उसे परोपकार का काम करना चाहिये। जिससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ सकती है। दूसरे की निंदा को छोड़ कर उसके प्रति अच्छे भाव रखना चाहिये। कहावत है की हम अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। मतलब अपने कार्य मे ध्यान नहीं देते जिससे हमें लाभ हो बलकी लोगों के बने हुए कामों को बिगाड़ने की कोशिश करने लगते है। जो की यहगलत बात है कि पीठ पीछे लोगो की निंदा करना उनके बारे में बुरा कहना हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये । न की अपने द्वारा कहे गये शब्द स्वयं का हास्य के विषय बने।

हमें न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के प्रति अच्छी सोच व उनके लिये मंगलकामना करना चाहिये। क्योंकि हम जैसा करेगें उसका फल वैसा ही होगा। अर्थात जैसी करनी वैसी भरनी